तोड़कर दिल मेरा जा रहे हो कहाँ

तोड़कर दिल मेरा जा रहे हो कहाँ
इश्क़ की जुस्त-जू में है आहो-फ़ुगाँ
toR’kar dil meraa jaa rahe ho kahaa’n
ishq kii just-juu mein hai aaho-fugaa’n
17:57 25-08-2013

अब किसे देखना है तुझे देखकर
तू इबादत मेरी ‘ तू ही मेरा जहाँ
ab kise dekh’naa hai tujhe dekh’kar
tuu ibaadat merii ‘ tuu hi meraa jahaa’n
18:06 25-08-2013

देखना है तेरी जोत को रात-दिन
नूर में तेरे शामिल है ये कहकशाँ
dekh’na hai terii jot ko raat-din
noor mein tere shaamil hai ye kah’kashaa’n
18:13 25-08-2013

जान, सजदे बिछाऊँ तेरी राह में
शिर्क की बात करने लगे सब यहाँ
jaan, sajde bichhaa’uu’n terii raah mein
shirk kii baat karne lage sab yahaa’n
18:20 25-08-2013

अहद करना वही तुम निभाना जिसे
राह मुश्किल हुई ‘ अजल है इम्तिहाँ
ahed karnaa wahii tum nibhaanaa jise
raah mushkil hu’ie ajal hai imtihaa’n
19:04 25-08-2013

ये गुलों से लदी शाख़ मुरझा गयी
सब ज़ख़्म ख़ुशबू के हो गये उर्रियाँ
ye gulo’n se ladii shaakh. murjhaa gayii
sab zakh.m kh.ushboo ke ho gaye urriyaa’n
20:31 25-08-2013

आज़मा लो मुझे जीत या हारकर
पर न कहना कभी तुम मुझे बद्‌गुमाँ
aazamaa ko mujhe jeet yaa haarkar
par na kah’naa kabhii tum mujhe bad’gumaa’n
21:50 25-08-2013

ऐ ‘नज़र’ ज़िंदगी बाँटती है ख़ुशी
क्या बनोगे नहीं तुम मेरे राज़दाँ
ai ‘Nazar’ zindagi baa’nT-tii hai kh.ushii
kyaa banoge nahii’n tum mere raazdaa’n
21:56 25-08-2013

212 212 212 212
बह्र-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०१३
Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 21:56 25-08-2013

इधर आ ज़रा बैठ गर प्यार हूँ मैं

इधर आ ज़रा बैठ गर प्यार हूँ मैं
वक़्त की तरह ही इंतेज़ार हूँ मैं
idhar aa zaraa baiTh gar pyaar hoo’n main
waqt kii tarah hii intezaar hoo’n main
18:22 24-08-2013

उठा जाम पीकर दिखा तू मुझे भी
ख़ुदा है अगर तू ‘ तलबगार हूँ मैं
uTha jaam peekar dikhaa tuu mujhe bhii
kh.udaa hai agar tuu’ talabgaar hoo’n main
18:27 24-08-2013

ये मंज़िल नहीं राह है प्यार की सो
बढ़ा जो क़दम तो गुनहगार हूँ मैं
ye manzil nahii’n raah hai pyaar kii so
baDhaa jo qadam to gunahgaar hoo’n main
18:44 24-08-2013

ख़ला में भटकता कहीं पर न कहता
तेरे रंग से क्यों ‘ शर्मसार हूँ मैं
kh.alaa mein bhaTakta kahii’n par na kahtaa
tere rang se kyo’n sharmsaar hoo’n main
19:07 24-08-2013

न आया, गया जो मेरी ज़िंदगी से
बड़ा आज तक बे-इख़्तियार हूँ मैं
na aaya, gayaa jo merii zindagii se
baDa aaj tak be-ikhtiyaar hoo’n main
19:12 24-08-2013

डराकर किसी ने उसे ये कहा है
निहाँ इल्म के पाँव का ख़ार हूँ मैं
Daraakar kisii ne usey ye kahaa hai
nihaa’n ilm ke paa’nw kaa kh.aar hoo’n main
20:54 24-08-2013

गुफ़्तगू करोगे किसी और दिन क्यों
जबकि आज ग़म में गिरफ़्तार हूँ मैं
guft-goo karoge kisii aur din kyo’n
jabki aaj gham mein giraftaar hoo’n main
21:22 24-08-2013

‘विनय’ दिल दुखा है मिरा आज फिर से
लरज़ता हुआ लबे-इज़हार हूँ मैं
‘Vinay’ dil dukhaa hai meraa aaj fir se
larazataa huaa lab-e-izahaar hoo’n main
22:46 24-08-2013

बहर/Baher:122 122 122 122
बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०१३
Poet Vinay Prajapati
Penned: 21:22 24-08-2013

फ़िज़ा में रंग घुल जाते हैं

मैं कभी सोचता हूँ कि
मेरी दुनिया क्या है?
ये दिल है
जो प्यार जैसे हुस्न के लिए तड़पता है
या वो
जिसका नाम ज़ुबाँ पर आते ही
फ़िज़ा में रंग घुल जाते हैं…

इक रोज़ मेरी मोहब्बत तारीख़ होगी
मेरी बात बारीक़ से भी बारीक़ होगी

मैं इश्क़ की जिस हद से गुज़र गया हूँ
क्या तू कभी उसमें शरीक़ होगी

शुआ किस सहर का इंतज़ार करती है
शायद तेरी नज़र से तख़लीक़ होगी

तेरी सादगी के सदक़े मरना चाहता हूँ
क्या कोई नीयत इतनी शरीफ़ होगी

मोहब्बत जो करे कोई तो रूह से करे
वरना बादे-मर्ग तकलीफ़ होगी

Penned on 01 January 2005

ज़िन्दगी धूल की तरह

ज़िंदगी धूल की तरह – हर मोड़ हर रहगुज़र से गुज़रते हुए – कभी दर्द की धूप में – कभी आँसुओं की रिमझिम में – भीगते बहते हुए बीत रही है – ख़ुशी की सहर और शाद की शाम मैंने तुम्हारे साथ देखी थी – फिर दोबारा आज तक देखी नहीं… हाँ जुदाई का एक क़लक़ -एक हैफ़… हनोज़ दिल में बाक़ी है… और दम-ब-दम दर्द को ईंधन झोंक रहा है… आँखों से वक़्त ने सब आँसू भी सोख लिये हैं… अब आँखें उदास… लब तिश्ना… दिल बेज़ार… ख़याल सूखे हुए… बेजान-से हैं। कोई उम्मीद बर नहीं आती… कोई राह नज़र नहीं आती… कोई चराग़ राहों में नहीं जलता… कोई दोस्त… कोई हम नफ़स… कोई ग़मग़ुसार… अब आस-पास नहीं है मेरे। चंद बेचैनियाँ… कुछ बेक़रारियाँ… कुछ भारी साँसें नफ़स का तार-तार तोड़ रही हैं। ज़ीस्त से दिलचस्पियाँ… जान से सब लगाव ख़त्म हो चुके हैं… बस किसी तरह इस बदन को ढो रहा हूँ। दिलासों की कोई आहट… साथ का कोई हाथ… अब मेरे दिल पर नहीं है…तुम बिन ज़िंदगी सफ़र तो कर रही है… मगर उसकी कोई मंज़िल नहीं है। बेमंज़िल ये सफ़र मानिंदे-सिफ़र लगता है… जहाँ से चलना शुरु करता हूँ वहीं आकर रुक जाता हूँ और आख़िरश वहीं आकर रुक जाता हूँ…क्योंकि मेरी मंज़िल सिर्फ़ तुम हो… और रह-रहकर हमेशा तुम ही मेरे तस्व्वुर को सजाती हो… रंगती हो… महकाती हो… इक नयी राह दिखाती हो… मगर फिर भी… तुम नहीं, तुम नहीं तो… यह सब एहसास बेमानी लगते हैं… तेरी कमी मेरे साथ-साथ परछाइयों की तरह चलती है और जब भी पीछे मुड़कर देखता हूँ… तो किसी हमदर्द दुश्मन की तरह लगती है…

तुम बिन मेरा जीना कितना मुश्किल है… कभी तुम यह ख़त पढ़ो तो तुम्हें ये ख़ुद-ब-ख़ुद समझ आये।

It was for SK

 

 

 

नम हैं आज तक यादों के सूखे पत्ते

मुझे क्या हुआ है मुझे कुछ पता नहीं है
क्या मेरे दर्दो-ग़म की कोई दवा नहीं है

यह उदासियों की शामें बहुत उदास हैं
मेरे नसीब में क्या मौसमे-वज़ा1 नहीं है

आफ़त यह हम पर टूटकर आयी है
इसे देखने को क्या कोई ख़ुदा नहीं है

सब आश्ना आज ना’आश्ना2 बन गये हैं
ऐ तीरगी3! मेरा कोई रहनुमा4 नहीं है

दिलचस्पियाँ जीने में ख़त्म हो गयी हैं
अब मेरी ज़िन्दगी में वह मज़ा नहीं है

हम हिज्र5 में रोज़ जीते-जी मर रहे हैं
जो हमपे आये क्या ऐसी कोई क़ज़ा6 नहीं है

हमें कब दोस्तों और दुश्मनों का डर है
करते हैं इश्क़ वो जिनको हया नहीं है

कब से बंजर पड़ी है मेरी आँखों की ज़मीं
इनपे छीटें उड़ाता अब्र7 कोई गया नहीं है

मुझे चुप देखके जो मेरा हाल पूछते हैं
कहता हूँ यही इक बात कुछ हुआ नहीं है

देखा गैरों का ढब और दोस्ती का पास भी
किसी भी दिल में मेरे लिए दुआ नहीं है

हम तमाम शब जलते हैं तेरी ख़ाहिश लिए
मेरी निगाह ने कोई रुख़ छुआ नहीं है

तुमको देखकर मैंने यह जान लिया है
तुमसे मेरा ताअल्लुक8 कोई नया नहीं है

क्यों हो इस बात से नाराज़गी किसी को
किसी से इश्क़ करना कोई ख़ता नहीं है

क्यों हैं यह फ़ासले, क्यों हैं यह दूरियाँ
क्या तू मुझको ख़ुदा की अता नहीं है

तुझे देखकर जो दीप जलाया था दिल में
तूफ़ानों के कारवाँ में भी वह बुझा नहीं है

लबों में दबा रखी हैं जो अब तक हसरतें
उनका क़ाफ़िला अभी तक गया नहीं है

फ़क़त तेरी यादों के जीने का सहारा क्या है
तेरे सिवा यह किसी से भी छुपा नहीं है

तुम्हें देखते ही गया दिल मैं क्या करता
तुम्हें पाने को मैंने क्या कुछ किया नहीं है

जब तुम नहीं पास में मेरे’ मैं क्या कहूँ
मेरे पास चीज़ और क्या-क्या नहीं है

रात ढलते-ढलते सहर में डूब गयी और
किरनों का अब तक कोई बसेरा नहीं है

शायद मानी मेरी ज़िन्दगी ने खो दिया है
कि मेरा अपना एक कोई तुम-सा नहीं है

गुपचुप बैठा है चाँद बादलों में कहीं
बहुत दूर से भी आती कोई सदा नहीं है

मैं भटकता हूँ देख तेरी राह की जानिब9
मुझे सुकूँ अब तस्वीरों से होता नहीं है

कभी बदले मेरा भी नसीबा और तू मिले
क्या मेरी क़िस्मत में कुछ ऐसा नहीं है

यह ज़िन्दगी की रात कब रौशन होगी
आज मेरी बाँहों में मेरी चन्द्रमा नहीं है

चाँद से चेहरों में भी वह नूर कहाँ है
मैंने देखे हैं हसीं कोई तेरे जैसा नहीं है

यह मोड़ उम्र का तेरे बिना तन्हा है
इक तेरे सिवा मैंने किसी को चुना नहीं है

हाले-दिल बयान तस्वीरों से करता हूँ
और कुछ करते मुझसे बना नहीं है

रह-रह के जो जलती-बुझती है जानम
वह उम्मीद पूरी तरह फ़ना नहीं है

मैं हूँ मुसाफ़िर तुम हो मेरी मंज़िल
मुझको रस्तों का कोई छोर पता नहीं है

कभी उदास कभी ख़ुश लगती हो मुझको
मुझे शामो-सहर10 का कुछ पता नहीं है

हूँ गर मैं मुकम्मिल11 सो तुमसे ही हूँ
वरना जहाँ में मेरा कोई अपना नहीं है

जागती आँखों से मैंने तेरे ही ख़ाब देखे हैं
और इस जीवन में कोई सपना नहीं है

मुझमें तख़लीक़12 मोहब्बत तुम से है
यह एहसास पहले कभी जगा नहीं है

जिस कशिश से खींचती हो तुम मुझको
जादूगरी में उस्ताद कोई तुमसा नहीं है

नाचीज़ का दिल धड़कता है आपके लिए
जौहराजबीं मैंने देखा कोई आपसा नहीं है

इस बेजान जिस्म को ज़रा-सी जान मिले
दिलो-धड़कन का कोई रिश्ता नहीं है

ताबीज़ तेरी यादों की दिल में पहने हूँ
हाल तेरे बीमार का बहुत अच्छा नहीं है

हलक़ में धँसे हुए हैं तेरे नाम के शीशे
मगर लहू मेरे लबों से टपकता नहीं है

ग़ुम हूँ आज तक उस हसीं शाम में कहीं
वह ढलता हुआ सूरज अभी डूबा नहीं है

क़त्ल जिन नज़रों ने किया था मुझको
किसी नज़र में वह हुनर वह अदा नहीं है

रोज़ तेरा निकलना गली में चाँद की तरह
दिल मेरा वह मंज़रे-हुस्न भूला नहीं है

ज़ख़्मों पर रखूँ किस मरहम का फ़ीहा
ग़ैरों में अपना दोस्त कोई लगता नहीं है

मैं कब जी सकता हूँ तेरे बिन सनम
मरने के सिवा पास कोई रास्ता नहीं है

हमें तिश्नगी13 में मिला ज़हराब14 सो पी गये
यूँ कभी ज़हर कोई चखता नहीं है

बह रहा था दरया लग के किनारे से
यूँ वह कभी बाढ़ के सिवा बहता नहीं है

न दिन में लगता है जी न रात में लगता है
मेरा ख़्याल इक वह भी रखता नहीं है

रहे-इश्क़15 का है वह मुसाफ़िर यारों
जो पैदल चलते हुए बरसों थकता नहीं है

हमने सुना है मिल जाती है मंज़िल उनको
जिनका हौसला कभी बुझता नहीं है

छाये हैं बदरा तो माहे-सावन16 ही होगा
वरना बादल यूँ कभी गरजता नहीं है

तुम्हीं से है इश्क़ मुझको’ जान लो
और यह दिल किसी से भी डरता नहीं है

नम हैं आज तक यादों के सूखे पत्ते
बीती गलियों में और कुछ उड़ता नहीं है

हम छोड़ आये हैं अपने आप को कहीं
पता मेरा मुझको भी मिलता नहीं है

जो किसी हर्फ़17 में तुम मिल जाती हो
जमता हुआ वक़्त फिर गलता नहीं है

सन्नाटों से बात करती हैं ख़ामोशियाँ
मीठा-सा दर्द आँखों में उतरता नहीं है

वह कौन-सी चीज़ है जिसे ढूँढ़ता-फिरता हूँ
मेरे सीने में साँस-सा कुछ बजता नहीं है

यह किधर चला आया हूँ ख़ुद नहीं जानता
यह दुनिया शायद मेरी दुनिया नहीं है

फ़क़त18 अपने से लड़ता हूँ ग़ैरों से कब
ख़ुद से मेरा झगड़ा कभी मिटता नहीं है

दमे-आख़िर19 जो मिले तो न कहेंगे तुमसे
अब किसी और ग़म का हौसला नहीं है

फूल खिलते हैं चमन में मेरे दिल के
मगर यह चमन अब महकता नहीं है

अर्ज़ किया जो इश्क़ तुम्हें तो क्या होगा
मेरे बारे में तुम्हें कुछ भी पता नहीं है

उठा था इक बादल का टुकड़ा पलकों तक
इक तेरे लिए वह भी बरसता नहीं है

दर्द का अब तो शाम-सा रिवाज़ हो गया
अब मीठे लबों से वह भी हँसता नहीं है

महसूस करो मेरा इश्क़ और लौट आओ
अब सफ़रे-ज़िन्दगी तन्हा कटता नहीं है

माज़ी की हवाओं में उड़ती है एक ख़ुशबू
क्यों उसे बाँधकर कोई रखता नहीं है

मैं दबा हूँ इस ज़मीं में अपने पैरों तले
अब इश्क़ पर मेरा ज़ोर चलता नहीं है

हमें कोई दोस्त उठाये इस लाशे पर से
जिस्म में साँस का कोई क़तरा नहीं है

फूलों से नाज़ुक ख़ुशबुओं का वह बदन
मेरे ख़ाब का महज़ एक टुकड़ा नहीं है

जो किया तुमने मुझपर वह जादू ही तो है
मेरे सीने में अब दिल धड़कता नहीं है

औराक़े-गुल20 पर मैंने जब शबनम21 देखी
क्यों मुझे याद और कोई रहता नहीं है

पीठ पीछे तुम चले गयी हाए वह वक़्त
क्यों वक़्त किसी के लिए रुकता नहीं है

मैं चला हूँ क़दम-क़दम तन्हा भीड़ में
आगे चलने वाला पीछे तकता नहीं है

ऊदे-ऊदे22 बादलों में चमकी है बिजुरिया
देखा उसे तो फिर कुछ दिखता नहीं है

तू लहरों पर चलती होगी शायद कभी
क्या तूने गीला मन मेरा छुआ नहीं है

कितनों से लाग23 रखा, दुनिया से वैराग है
तेरे सिवा क्योंकि कोई जचता नहीं है

मोहब्बत है क्या उसे खोना या पा लेना
हमें जीने मरने का फ़र्क़ पता नहीं है

जाना तेरा हुआ और सब कुछ लुट गया
दाग़े-हिज्र24 हाथ की लकीरों से छूटा नहीं है

सुनसान बीती गलियों में भटकते हैं हम
हमें अब कहीं कोई आवाज़ देता नहीं है

मेरे ख़ुदा इल्तजा मान ले इस ग़रीब की
ग़ैर हैं सब, मेरा कोई मसीहा नहीं है

काँच का बना हूँ या फिर मिट्टी से बना हूँ
जो भी हूँ क्यों मेरा दिल पुख्ता नहीं है

वह किन हालात में गया है मैं जानता हूँ
यह भी यक़ीन है कि वह बेवफ़ा नहीं है

मैं न कह पाया वह तो आया था मेरे घर
इस फ़ासले में उसकी कोई ख़ता नहीं है

बस ग़ैर हैं सब मुझसे ज़माने भर में
किसी ने मेरा मुझसे कुछ भी लिया नहीं है

दरकार25 है मुझको मेरे ख़ुदा से सिर्फ़ तू
मुझे जहानो-शय26 से कोई वफ़ा नहीं है

ख़यालों के पत्थरों में मैं मसला गया हूँ
किस-किस पल मेरा दिल दुखा नहीं है

ज़बाँ से कभी कुछ न कहा मैंने तुझसे
क्या तुमने भी कुछ आँखों में पढ़ा नहीं है

मैं भी ख़ुश नहीं हूँ’ तुम भी ख़ुश नहीं होगी
दर्दे-जुदाई27 मेरे मन से बुझा नहीं है

मुझे कोई राह दिखाये रहनुमा28 बनकर
इन अंधेरी गलियों में कोई दिया नहीं है

बहुत तड़पती है जिस्म की क़ैद में रूह
है उसको भी तेरा ग़म कि मुर्दा नहीं है

इन्तिहाँ29 भी होगी इम्तिहाँ30 मुझको
तुम नहीं गर’ ज़िन्दगी की इब्तिदा नहीं है

मैं जो तुमसे दूर यहाँ पर साँस लेता हूँ
यह मेरी मजबूरी है जानम, दग़ा31 नहीं है

है अंधेरी, काली, गहरी रात इन आँखों में
क्यों मेरे आलम में चाँदनी रिदा32 नहीं है

आऊँ तो किस तरह आऊँ तेरे पास मैं
वक़्त के पहले आने का फ़ायदा नहीं है

इन हवाओं से कहा है जायें तेरे घर तो
पैग़ाम दें मेरा कोई तेरे सिवा नहीं है

क्या पियूँ मैं तेरी आँखों से पीने के बाद
दुनिया की किसी शय में ऐसा नशा नहीं है

इश्क़ करिये तो फिर पछतायिए क्या
इश्क़ एक एहसास है कोई बला नहीं है

हर पल मैं तन्हाइयों से भागता रहा हूँ
मेरे दिल में तू है कोई ख़ला नहीं है

मेरी हद न पूछो जो मुझे तुमसे इश्क़ है
कोई यह कह दे ‘विनय’ बावफ़ा नहीं है!

बुझा मेरे दर्द इश्क़ की आग से आज
जला है इश्क़ में ‘नज़र’ कि बुझा नहीं है

पूछता है ज़माना ‘नज़र’ की शायरी को
किस दिन किताब में तुझको लिखा नहीं है

शब्दार्थ:
1. बहार का मौसम, season of spring; 2. अजनबी, stranger; 3. अंधेरा, darkness; 4. रास्ता दिखाने वाला, motivator; 5. बिछोह, separation; 6. मृत्यु, demise; 7. बादल, cloud; 8. सम्बंध, relation; 9. तरफ, by side; 10. शाम और सुबह, evening and morning; 11. पूर्ण, complete; 12. उद्भवित, creation; 13. प्यास, thirst; 14. विषैला जल, poisonous water; 15. प्रेम का मार्ग, path of love; 16. सावन का महीना, season of rain; 17. शब्द, word; 18. मात्र, only; 19. मृत्यु-क्षण, demise; 20. फूल की पंखुड़ियाँ, petals of flower; 21. ओस, dew; 22. गीले-गीले, wet; 23. ईष्या, enmity; 24. बिछड़ने का शाप, curse of separation; 25. आवश्यकता, need; 26. दुनिया और वस्तु, world and things; 27. बिछड़ जाने की पीड़ा, pain of separation; 28. मार्गदर्शक, guide; 29. जीवन का अंत, end of life; 30. परीक्षा, examination; 31. धोख़ा, cheat; 32. चादर, bedspread


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४