देखे जिसे कोई हसरतों से ऐसा तो नहीं हूँ मैं

देखे जिसे कोई हसरतों से ऐसा तो नहीं हूँ मैं
अक़ीदत करें जिसकी वह ख़ुदा तो नहीं हूँ मैं

माना यकता हूँ मेरे जैसा कोई दूसरा नहीं
फिर भी हर मायने में पहला तो नहीं हूँ मैं

जी रहा हूँ अब तक बिन तेरे तन्हा-तन्हा
जो असरकार हो जाये वह सदा तो नहीं हूँ मैं

क्यों न थके मेरी ज़बाँ कहते-कहते सबको अच्छा
कोई बातिल कोई पारसा तो नहीं हूँ मैं

न लड़ मुझसे मेरे रक़ीब इल्तिजा है तुझसे
जो आते-आते रह जाये वह क़ज़ा तो नहीं हूँ मैं

यक़ीनन वह बेहद ख़ूबसूरत है ‘नज़र’
वह न मिले मुझे इतना भी बुरा तो नहीं हूँ मैं

अक़ीदत:Adore, Affection | यकता: Matchless, Incomparable
बातिल: Void, झूठा । पारसा: महात्मा, Saint | रक़ीब:enemy | क़ज़ा:Death


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला
मुझको हर गाम नीचा दिखाके क्या मिला
हर वक़्त इम्तिहान और बस इम्तिहान
मुझको राहे-ख़ुदा में और कुछ भी न मिला

ख़ाली सीने में दर्द ही ज़मीं दर्द ही आसमाँ
दूर तक राहों में दर्द के निशाँ बस निशाँ
बाहर आ गया जिगर फाड़ के क़तराए-लहू
ऐ ख़ुदा तूने दिया मुझको किस बात का सिला

हँसना मुझे रक़ीब का’ तीर-सा लगता है
रखे अगर वह बैर मुझसे रखता है
जाने उसकी आँखों में मैं खटकता हूँ कि नहीं
ऐ ख़ुदा हर बार मैं ही क्यों मूँग-सा दला

राहे-इश्क़ में मुझे पत्थर का दिल नहीं
ज़ीस्त यह गँवारा मुझे बिल्कुल नहीं
मैं ख़ुदा को किसका वास्ता देकर कहूँ कि बस!
ख़ुदा-ख़ुदा कहने से हासिल कुछ भी न मिला

अपने ज़ख़्मों पे ख़ुद आप मरहम रखूँ
यह दर्द अगर कहूँ तो आख़िर किससे कहूँ
बात-बात पे ख़ुद से बिगड़ना आदत बन गयी
दरबारे-ख़ुदा से मुझको कुछ भी न मिला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

दिले-सहरा में यह कैसा सराब है

दिले-सहरा में यह कैसा सराब है
ज़ख़्म मवाद है आँख मेरी बेआब है

क्यूँ इश्क़ ख़ौफ़ खा रहा है हिज्र से
नस-नस में मेरी कोई ज़हराब है

सुलगते हैं तेरे ख़्याल शबो-रोज़
गलता हुआ तेज़ाब में हर ख़ाब है

जुज़ बद्र कौन मेरा रक़ीब जहाँ में
मेरी ख़ाहिश को लाज़िम कैसा नक़ाब है

भटकती है नज़र किसकी राह में
उल्फ़त को मेरी क्या-क्या हिसाब है

ज़िन्दगी कब शक़ खाती है मौत से
मौत को भी ज़िन्दगी से क्या हिजाब है

हर्फ़ मेरे और तसलीम नहीं देते
कि ‘नज़र’ को दर्द से क्या इताब है

सराब= मरीचिका, Mirage, बेआब= सूखी, ज़हराब= ज़हरीला पानी, जुज़= केवल
बद्र= पूरा चाँद, रक़ीब= दुश्मन, हिजाब=पर्दा, शर्म, इताब= गुस्सा, Rebuke


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

और कैसे रक़ीब के यार हमसे पेश आते

और कैसे रक़ीब के यार हमसे पेश आते
वह हमसे अय्यारी नहीं तो और क्या फ़रमाते

हमारी क़िस्मत में जीते-जी फ़ना होना लिखा था
क्योंकर न हम अपने रक़ीबों से मात खाते

मैं ही मिला अपने ख़ुदा को इस सबके लिए
हरीफ़ाना क्योंकर न मेरे रक़ीब पेश आते

न कोई यार है न कोई दुश्मन किसी का
अपने-अपने मतलब के लिए सब हाथ हैं मिलाते

क्यों दिल के टुकड़ों से अब भी आह निकलती है
किसके पास सच्चे दोस्त हैं, किसको समझाते


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

पैमाने दर्द के रोज़ छलका करते हैं

नहीं कोई दोस्त मेरा न सही
रक़ीबों से मिल के दिल हल्का करते हैं

सैलाबे-क़लक़ चढ़ता जाता है
पैमाने दर्द के रोज़ छलका करते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४