वक़्त का पहना उतार आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये

ख़ाबों में सही अपना तो माना
दिल को मेरे अपना तो जाना

खट्टे-मीठे रिश्ते चख लिये हैं
कुछ सच्चे पलकों पे रख लिये हैं

ख़ाहिशों का बवण्डर है दिल
दिल को उसके दर पे छोड़ आये

तेरी रज़ा क्या मेरी रज़ा क्या
वफ़ाई-बेवफ़ाई की वजह क्या

दस्तूर-ए-इश्क़ से रिश्ते हुए हैं
दिलों में रहकर फ़रिश्ते हुए हैं

ख़ला-ख़ला सजायी एक महफ़िल
महफ़िलों से उठके चले आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

एक रोशनी देखा करते थे

तेरी चौखट पे
एक रोशनी देखा करते थे
अब न वो दिखती है
और न तुम…

रुसवा ज़िन्दगी के पल हुए
तेरी खु़दाई रंग लायी
एक रिश्ता बाँधकर
तुमने उसे तोड़ दिया…

क्या तुम्हें हम बेवफ़ा मान लें
या इसे वक़्त की रज़ा समझें
रात की घनेरियाँ छायी हैं
और सिर्फ़ एक सितारा नज़र आता है…

चलती है जो नब्ज़ तेरे बिना
उसमें ज़िन्दगी कहाँ है
हज़ार ज़ख़्म हों जिस्म पे
उनसे दर्द का बढ़ना कहाँ है

एक पल में वह
सालभर का रिश्ता तोड़ गये
जोड़े कई ग़म
और मेरा आशियाँ तोड़ गये


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२