जब बात करते हुए देखता हूँ

तमन्ना बेताब रहती है
और खा़हिश परेशाँ
उदास आईने-
खु़द-ब-खु़द टूटते रहते हैं
राह चलती रहती है
पाँव थक जाते हैं
उम्र कम होती रहती है
साल बढ़ते रहते हैं

रात जागती है आँखों में
दिन वीरान उजाड़ गुज़रता है
उँगलियों में उँगलियों से
और निगाहों को बदन से
जब बात करते हुए देखता हूँ
तेरी याद खा़मोश रह जाती है
कुछ सुलगता रहता है सीने में

तन्हाई का साया न टलता है
दिल की ख़ला न घटती है
अरमान सूखे हुए पत्तों की तरह
ज़मीन पर पडे़ रहते हैं
आँसुओं में भीगते-भीगते
ज़मीन में जज़्ब हो जाते हैं
दफ़्न हो जाते हैं

दिल के टूटने से
फ़र्क साँस लेने लग जाता है
फ़ज़ा तो नहीं बदलती
लेकिन उसकी छुअन
और एहसास के ज़ख़्म हरे हो जाते हैं
लम्हा-लम्हा मन ग़म में डूबता जाता है
और गीला-गीला जलता रहता है
 


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’

ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं

आइने रातभर रोते रहे
तस्वीरें रातभर जागती रहीं
लम्हे उम्रभर सिसकते रहे
ख़ामोशियाँ उम्रभर ख़ाक फाँकती रहीं

यादें धूप में सूख रही हैं
बातें सब मुरझा गयी हैं
आँखों में दरार पड़ रही है
सपने बंजर हो गये हैं

आँसू बर्फ़ बन गये हैं
ख़ाहिशें तिनके चुन रही हैं
आरज़ू के पाँव थक चुके हैं
ख़्याल ज़मीन में दफ़्न हो गये हैं

साँसें सीने में भीग गयी हैं
उदास सावन टपक रहा है
जंगल तन्हाई में सुलगता है
फूल पलकें झुकाये हुए हैं

ख़ुशबू बे-सदा गल रही है
पलाश के फूल हँस रहे हैं
जड़ें मिट्टी सोख रही हैं
पत्ते सूखी बेलों ने डस लिये हैं

उजाले पत्थरों में जज़्ब हो गये हैं
चाँद धुँध हो रहा है
रात रेत हो गयी है
सितारे रेत के दरया में बह रहे हैं

दर्द तेज़ाब हो गया है
और खु़शी मग़रूर रहती है
मैं शब्द उगलता रहता हूँ
ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’