यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला
मुझको हर गाम नीचा दिखाके क्या मिला
हर वक़्त इम्तिहान और बस इम्तिहान
मुझको राहे-ख़ुदा में और कुछ भी न मिला

ख़ाली सीने में दर्द ही ज़मीं दर्द ही आसमाँ
दूर तक राहों में दर्द के निशाँ बस निशाँ
बाहर आ गया जिगर फाड़ के क़तराए-लहू
ऐ ख़ुदा तूने दिया मुझको किस बात का सिला

हँसना मुझे रक़ीब का’ तीर-सा लगता है
रखे अगर वह बैर मुझसे रखता है
जाने उसकी आँखों में मैं खटकता हूँ कि नहीं
ऐ ख़ुदा हर बार मैं ही क्यों मूँग-सा दला

राहे-इश्क़ में मुझे पत्थर का दिल नहीं
ज़ीस्त यह गँवारा मुझे बिल्कुल नहीं
मैं ख़ुदा को किसका वास्ता देकर कहूँ कि बस!
ख़ुदा-ख़ुदा कहने से हासिल कुछ भी न मिला

अपने ज़ख़्मों पे ख़ुद आप मरहम रखूँ
यह दर्द अगर कहूँ तो आख़िर किससे कहूँ
बात-बात पे ख़ुद से बिगड़ना आदत बन गयी
दरबारे-ख़ुदा से मुझको कुछ भी न मिला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे

दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे
क़ुछ यक़ीन ख़ुद पर रहे
ऐसा ज़माने को वास्ता दे

मैंने सपनों में सजायी जो सूरत है
आज मिली वह ख़ूबसूरत है
दिल, जाने क्या हो गया है
सोचो तो ज़रा क्या खो गया है
मेरी कहानी में यह क्या मोड़ आ गया
तुम आकर मिलो…

दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे
क़ुछ यक़ीन ख़ुद पर रहे
ऐसा ज़माने को वास्ता दे

आँखें मिलाकर नींदे चुराकर ले गया जो
जिसकी शोख़ अदा पर
हम मर मिटे वह गया तो
फिर कैसे यह ख़्याल रह गया
हर साँस में कैसा यह सवाल रह गया
भूलें कैसे हुआ जो…

दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे
क़ुछ यक़ीन ख़ुद पर रहे
ऐसा ज़माने को वास्ता दे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९