दर्द को दर्द का मरहम दे दे

दर्द को दर्द का मरहम दे दे
ऐ मौत न आने की क़सम दे दे

लगन यार की मन से जाये ना
दिल की तड़प काम आये ना
नहीं आता तो आने का वहम दे दे

मैं बिखर गया तेरे जाने के बाद
जाना प्यार तुझे खोने के बाद
मिलने का कोई वादा सनम दे दे

ऐ मौत न आने की क़सम दे दे…

मसला मुझे विरह की रातों ने
तोड़ा-जोड़ा मुझे बीती बातों ने
मेरी रूह को चैन हमदम दे दे

यह ख़ुमार अब आठों पहर है
ज़िन्दगी जैसे कोई ज़हर है
मुझको वही ख़ुशी का मौसम दे दे

ऐ मौत न आने की क़सम दे दे…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

जब ख़ुद को ख़ुद से तन्हा पाता हूँ

जब ख़ुद को ख़ुद से तन्हा पाता हूँ
मैं बस तेरे क़रीब चला आता हूँ

क्यों न कहा तुमसे कभी हाले-दिल
क्यों आज रोता हूँ पछताता हूँ

बरसों से पड़ी हैं विरह में सूखी-सूखी
मैं क्यों आज आँखों को भिगाता हूँ

जब मेरे दर्दों को कोई नहीं सुनता
मैं दर्दों को जलाता हूँ बुझाता हूँ

तुम गये आँखों से रोशनी गयी
बुझी आँखें तेरे ख़ाबों से जलाता हूँ

बहुत दिन हुए चाँद की बात न की
सुबह-शाम तेरे साथ बिताता हूँ

मेरे चमन को बहार ने रुख़ न किया
मैं पतझड़ ओढ़ता हूँ बिछाता हूँ

ऐ ‘नज़र’ तुझे क्या हुआ? क्यों चुप है?
लहू से तर दामन मैं रोज़ सुखाता हूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

वह कब आयेगी

वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी
जिसका इ‍ंतिज़ार करता हूँ यारा
जिसके लिए फिरता हूँ मारा-मारा
वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी
वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी

हमने राहों में लाखों हसीं देखे हैं
उनकी बाँहों में हमनशीं देखे हैं
मेरी कब कोई हमनशीं होगी
हाँ, मेरी कब कोई हमनशीं होगी
वह जो मेरी जान जाँनशीं होगी

वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी
अपना बनाके मुझे इश्क़ सिखायेगी
वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी

सोचो बीस बरस गुज़रे तन्हा-तन्हा
अब न रहना मुझे तन्हा-तन्हा
कह दो उसे जाकर मुझे दरस दे
न मुझे दूरी का इक और बरस दे
मेरी जान में जान कब आयेगी

वह कब आयेगी जो मुझे चाहेगी
जिसका इ‍ंतिज़ार करता हूँ यारा
जिसके लिए फिरता हूँ मारा-मारा

उससे कहो अपनी इक झलक दे
ज़मीं तो मिली है थोड़ा फ़लक़ दे
अब जिस्म से जान, अब जायेगी
वह मुझे और कितना तड़पायेगी
विरह की सूनी रतियाँ सुलगायेगी

वह अब आयेगी जो मुझे चाहेगी
जिसका इंतिज़ार करता हूँ यारा
जिसके लिए फिरता हूँ मारा-मारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४