उस्लूब, उस्लूब, उस्लूब

उस्लूब*, उस्लूब, उस्लूब
क्या पढ़ने वाले इनको समझते हैं
वज़नी हो सीने पर गर ज़ख़्म
उसे पढ़ने वाले दर्द को समझते हैं

* लेखन के नियम अथवा शैली


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा

वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

नम है नफ़स-नफ़स मेरे सीने में
क्यों खर्च नहीं होती साँस जीने में

मेरी बाक़ी ज़िन्दगी का तुम ही सहारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

नामे-इश्क़ जायेगा मेरा सब-कुछ
क़िस्मत क्यों नहीं कहती आज कुछ

नाख़ुदा कश्ती को कब मिलेगा सहारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

‘नज़र’ को नयी ज़ीस्त दी तुमने शीना
जीने का तुमने सिखाया मुझको क़रीना

तेरे ही साथ मैंने हर लम्हा गुज़ारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

वज़नी: heavy; नफ़स: breath; नाख़ुदा: boater, sailer;
ज़ीस्त: life; शीना: shine; क़रीना: style


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

अब तो मौत को भी

आज दिन यूँ गुज़रा है झूठी मुस्कुराहट में
कि अब हँसता हूँ तो लगता है
खु़द-फ़रेबी कर रहा हूँ मैं…

दर्द के सिक्के
दिल में खनकते ही रहते हैं
बजते हैं कभी तो
साँसें वज़नी हो जाती हैं
अश्क तो टपकते नहीं है मगर –
आँखें खुश्क हो जाती हैं…

बस यूँ ही लगता है हर पल
कि मौत मुझे अपने गले लगा ले
अब तो मौत को भी
तुझ पर तरस नहीं आता ‘विनय’!

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३