बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली
मैंने अपना बदन सेंका,
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली
मैंने तस्वीरे-आज फेंका…

मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं

रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़

लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

अश्को-अक्स चश्म में नहीं है

जितनी मै उन आँखों में थी
उतनी और कहाँ
जितना सुरूर उन आँखों में था
उतना और कहाँ

रोज़ शाम दरवाज़े पे बैठता हूँ
आज वह कहाँ
नक़्शए-क़दम उड़ गये धूल में
आज वह कहाँ

उसने शहर बदला है या घर
जानिब वह कहाँ
यह सीना ख़ाली हुआ जाये है
मौत वह कहाँ

अश्को-अक्स चश्म में नहीं है
न वह यहाँ, न हम यहाँ…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

इस पुराने शहर में

इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें हैं
कुछ खण्डहर हैं
कुछ अजनबी रास्ते हैं

दूर से पत्थर दिखता होगा
बेजान दिल मेरा लगता होगा
छूकर देखो,
दीवारें आज भी साँस लेती हैं
न कहती हैं न सुनती हैं
टूटती-गिरती हैं…

जब भी गुज़रता हूँ
साये मुझको पुकारते हैं
इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें हैं
कुछ खण्डहर हैं
कुछ अजनबी रास्ते हैं

कितने ख़ाबों के बादल बरसे
कितनी ख़ुशबू की बेले महकीं
हर बार,
नशेमन जलकर खाक हुआ
चिन्गारियाँ,
दिलों में जब-जब दहकीं…

जो भीगकर मिटती हैं
कुछ ऐसी भी इबारतें हैं
इस पुराने शहर में
कुछ पुरानी इमारतें हैं
कुछ खण्डहर हैं
कुछ अजनबी रास्ते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३

किस राह को चल रहे थे

किस राह को चल रहे थे
किस राह को हम चल दिये,
उनसे प्यार लिए
हम चले इक नये सफ़र पर,
लुटा दिया सारा जो कुछ था
उनकी इक नज़र पर,
कुछ कर गुज़रने की तमन्ना लिए
अकेले हर मंज़िल तक चल रहे,
जाने किसका ख़्याल लिये…

दूरियाँ बहुत हैं लम्बे हैं रास्ते
मगर हम चले किसी के वास्ते
जिस डगर पर भी रुके
वहाँ कुछ अपने बन गये
किस राह को हम चल रहे थे
किस राह को हम चल दिये…

इक बात थी दिल में
सबको प्यार देने की
और हमेशा हम बाँटते रहे,
उड़ते बादलों की तरह
हम चले हर डगर, हर नगर
जाने क्यों छा गये, बेग़ाने शहर पर

क्या चाहें वह हमसे हम समझ गये
कोई मिले इस सफ़र में
तारीख़ों के गुज़रते मंज़र में
यह क्या हुआ हम कहाँ रुक गये
फिर सभी हमसे मिल गये
किस राह को चल रहे थे
किस राह पर हम रुक गये…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

हम तन्हा और यह सफ़र तन्हा

हम तन्हा और यह सफ़र तन्हा
तुझे ढूँढ़ने वाली यह नज़र तन्हा

यूँ तो तेरी तस्वीर है दिल में मगर
फिर भी यह दीवारो-दर तन्हा

घर में हम हैं और आईना भी है
बिन तेरे हम दोनों यह घर तन्हा

तुम्हें देखा आज फिर रू-ब-रू, सामने
तुम्हें न दिखा हूँ इस क़दर तन्हा

बिन तुम्हारे इस तरह तन्हा हूँ
जैसे बिन फूलों के कोई शज़र तन्हा

बिन तुम्हारे कहीं दिल लगता नहीं
तुम बिन मैं जाऊँ किधर तन्हा

तुम नहीं तो यूँ लगता है मुझको
मैं हूँ आज भी शहर-ब-शहर तन्हा

जलेंगे सारी-सारी रात आज फिर हम
रहेगी आज फिर रहगुज़र तन्हा

गर तेरी यादें न होती तो क्या कहूँ मैं
जाता ज़िन्दगी का हर पहर तन्हा

दरिया का पानी बाँध दिया है किसी ने
बिन पानी हुई यह नहर तन्हा

न चाँद हँसा न खु़र्शीद मुस्कुराया
तुम बिन यह शामो-फ़ज़िर तन्हा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १७ अगस्त २००४