आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है
दिल को बहलावा नहीं दर्द दिया जाता है
दर्द जो है इश्क़ में वह ही ख़ुदा है सबका
दर्द के पहलू में यार को सजदा किया जाता है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

तुम याद आ रहे हो और तन्हाई के सन्नाटे हैं
किन-किन दर्दों के बीच ये लम्हे काटे हैं
अब साँसें बिखरी हुई उधड़ी हुई रहती हैं
हमने साँसों के धागे रफ़्ता-रफ़्ता यादों में बाटे हैं

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…

इस जनम में हम मिले हैं क्योंकि हमें मिलना है
तुम्हारे प्यार का फूल मेरे दिल में खिलना है
दूरियाँ तेरे-मेरे बीच कुछ ज़रूर हैं सनम
मगर यह फ़ासला भी एक रोज़ ज़रूर मिटना है

आँखों की ख़ुशबू को छुआ नहीं महसूस किया जाता है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैं हूँ चाँद है तुम भी होगी कहीं

मैं हूँ, चाँद है, तुम भी होगी कहीं
मैं देखता हूँ जो चाँद को…
तुम भी इसे देखती होगी कहीं

माहे-कामिल ने देखा है मुझे
तेरे पाँव के निशाँ पे सजदा करते हुए
सहर उस वक़्त दरक रही थी
सूरज आ रहा था कमसिन किरनें लिए

यह हवा यह घटाएँ
सभी से मैंने कहा था, कहना
मुझे प्यार है तुमसे
जाने तुमने मेरी सदा को
महसूस किया होगा कि नहीं

मैं तन्हा ही तन्हाइयों को दोहराता हूँ
दिल की सदाओं से तुमको बुलाता हूँ
तुम चले आओ सुनकर मेरी सदा
मैं रोज़ ही गीली पलकें सुखाता हूँ

मेरी आँखों ने देखे हैं
कई टूटते हुए सितारे
जिनको तुमने भी देखा होगा
जाने उन्होंने तुमको मेरी
क़िस्मत में लिखा होगा कि नहीं

माहे-कामिल= full moon, पूर्णिमा का चाँद


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १८ मई २००३

सूखे हुए तिनकों को आशियाँ कहिए

सूखे हुए तिनकों को आशियाँ कहिए
जो सबपे खुला हो उसको निहाँ कहिए

ज़ुल्म को अपने इम्तिहाँ कहिए
जो बार-बार मिले उसको जाँ कहिए

मरज़ी आपकी मुझको बेवफ़ा कहिए
यह न कहिए तो और क्या कहिए

जो याद आता हो रह-रहके आपको
उसको ज़हर बुझाया पैकाँ कहिए

शिकन सिलवटें सब आँखों में रखिए
फिर ख़ुदा से फ़रियादो-फ़ुग़ाँ कहिए

जिस पर हर कोई सजदा बिछाये
उसको महज़ संगे-आस्ताँ कहिए

हर वो बात जो कि सच है सही है
उसे कहने वाले को बदज़ुबाँ कहिए

न मानिए किसी की जो जी में आये करिए
दूसरों को ज़मीं ख़ुद को आस्माँ कहिए

रंगारंग महफ़िलों में रोज़ जाइए
बिन बुलाये हुए को मेहमाँ कहिए

पूछिए की मोहब्बत क्या है कहाँ है
किसी दोस्त की वफ़ा को बेईमाँ कहिए


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३