वह दिल में एक मस्जिद है

वह दिल में एक मस्जिद है
जिसमें रोज़ नमाज़ अदा करता हूँ
वह मन मन्दिर की देवी है
जिसकी साँझ-सवेरे पूजा करता हूँ

मैं ख़तावार हूँ गुनाहे-इश्क़ का
उसके दर पे रोज़ सजदे करता हूँ
वह संगदिल है नरम दिल भी
अपनी जान उसके सदक़े करता हूँ

मैंने उसके नाम से जीना जाना है
मैं बेपनाह उससे मोहब्बत करता हूँ
सारे जहाँ में वह ख़ुदा है मेरा
मैं सिर्फ़ उसकी अक़ीदत करता हूँ

मैं तलबगार हूँ उसके दिल का
अपना यह दिल उसके नाम करता हूँ
वह सिर्फ़ो-सिर्फ़ मेरा है बस
मैं हर मुक़ाबिल को पैग़ाम करता हूँ

” कोई एक भी नहीं मुझसा ज़माने में
  एक दौर गुज़ार दोगे आज़माने में
  हर हाल में जीतना मेरी फ़ितरत है
  सौ उम्र लगा दोगे मुझको मिटाने में “


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

नित उड़ता हूँ तेरी कजरारी अँखियों में

नित उड़ता हूँ तेरी कजरारी अँखियों में
मैं रंग-बिरंगे सपनों की छतरी लेके
साँवले का मन लुभाके, बिजली गिराके
राधा चली कहाँ ऐसे गगरी सँभाले

इठलाती है बल खाती है जिया जलाती है
राधा काहे साँवले से इतना इतराती है
हरी चुनरिया पवन जब उसकी उड़ाती है
गुलाबी बदन की भीगी धूप उड़ाती है

साँझ का घूँघट ओढ़े पनघट उतरती है
गगरिया छलकाती द्वार से निकलती है
सतरंगी छटा जो उसके रूप की बरसती है
मन की मरूस्थली उसके लिए तरसती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ०५ जून २००३

साँझ-सवेरे ऐसे मेरे जैसे तेरी आँखों के दरपन

साँझ-सवेरे  ऐसे मेरे  जैसे  तेरी आँखों के  दरपन
शबो-रोज़ यूँ बोझल हैं जैसे मेरे दिल की धड़कन

कली-कली ख़ुशबू-ख़ुशबू खिलने लगी उपवन-उपवन
खनक रही है पत्ती-पत्ती शुआ-शुआ है आँगन-आँगन

चाँदनी संग तारों के मुस्कुरा रही है छत-छत पर
जल रहा है सुलग रहा है ज़ख़्मी साँसों से तन-मन

सफ़र करते-करते दश्तो-सहरा से जी भर आया
दोनों तर आँखें सूख गयीं हैं टूट रहा है नील-गगन

जुज़ दर्द नुमाया क्या हो तन्हा आँखों में ‘नज़र’
तीरे-सैय्याद ने  मार गिराया  है  इक और हरन


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

अपना अक्स देखा

आज राह चलते-चलते
इक आईने में अपना अक्स देखा
बड़ा ग़ुरूर था मुझे खु़द पर
न मैंने अपने अंदर का नक्स देखा

आईने ने बताया मेरा चेहरा क्या है
जान पाया आज मैं,
साँझ क्या है सवेरा क्या है…

उम्मीद कर रहा था जिसकी
वह असलीयत खुलकर सामने आयी
रूह ने मेरी…
आज सारी रात, मुझसे खू़ब बातें कीं
कि मुझको थामने आयी…

कमस-कम आज यह तो जाना
शक़्ल का नक़ाब अक़्ल को
किस तरह ढक लेता है,
अब कोई न ग़ुरूर होगा और न कोई ग़लती…
आज की रात आँखों से आँसू न बहे,
नींद बह गयी…

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३