फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना

फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना
यह कि झूठ को सच मतलब को मन जाना

वहम की धूल जब गिरी पलकों से
हमने सच और झूठ का सारा फ़न जाना

आँखों से आपकी तस्वीर उतारी न गयी
हमने शबो-रोज़ चाँद को रोशन जाना

जिस्म ख़ाहिशमंद था रूह सुलगती थी
हमने बुझते बादलों को सावन जाना

हम भी शाइरी के फ़न सीखने लगे ‘नज़र’
जबसे जन्नतो-जहन्नुम का चलन जाना

फ़िराक़= separetion, अजल=death, fate, विसाल=meeting


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

ख़ामोशी ही ख़ामोशी है

ख़ामोशी ही ख़ामोशी है अंधेरी रातों में
चाँद भी कहीं खो गया है तारों में

तन्हाई है तन-मन में,
ख़ाबों का आशियाँ बनाया था हमने
वह बिखरा पड़ा है यहीं-कहीं पे,
फूल-पत्तों का मौसम जा चुका है
पतझड़ लगा है बरसने…
पीले पत्ते लगे हैं गिरने…

ख़ामोशी ही ख़ामोशी है अंधेरी रातों में
चाँद भी कहीं खो गया है तारों में

मौसम के फूलों में जो ख़ुशबू थी
वह अब नहीं है उनमें,
कैसे बेरंग हुए सब यहाँ पर
कोई अपना नहीं है इनमें,
बादलों का मौसम आ रहा है
सावन लगा है तरसने…

ख़ामोशी ही ख़ामोशी है अंधेरी रातों में
चाँद भी कहीं खो गया है तारों में

अब कहाँ है रोशनी मैं हूँ बेख़बर,
जाने कब होगा ख़त्म
मंज़िलों का यह तन्हा सफ़र,
जाने कब आयेगा वह मेरा हमसफ़र
दिल बेख़बर, दिल बेसबर…
दिल बेसबर, दिल बेख़बर…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

यह मौसम है मस्त-मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त
अम्बर पे छायी काली घटा
सावन बरसे कर दे मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त

तन भीगेगा मन भीगने दे
मन भीगेगा तन भीगने दे
डोल-डोल जा झूम-झूम जा
गा रही रिया गा रहा जिया

गाये कोयलिया कुहू-कुहू
बोले पपीहरा पिहू-पिहू
सात सुरों में बंधी पायलिया
मन को कर दे मद्-मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त
अम्बर पे छायी काली घटा
सावन बरसे कर दे मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त

बाग़िया में कोंपल हैं फूले
पेड़ों की डालों पर डाले झूले
रंग चढ़ा है जोबन का
जो न उतरे कर दे मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त
अम्बर पे छायी काली घटा
सावन बरसे कर दे मस्त

यह मौसम है मस्त-मस्त
यह आलम है मस्त-मस्त


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

दिल की लगी दिल को दिल से लगी

दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आग फिर न बुझी
यह दिल की लगी है दिल से लगी है
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है

उठता है तूफ़ाँ दिल में बनते हैं निशाँ
फैला हर दिशा यह यहाँ से वहाँ
बसा है दो दिलों में ख़ुशबू की तरह
नाम मुहब्बत है ख़ुदा की तरह
पतझड़ जाता है और सावन आता है
जब दिल में कोई उन्स जगाता है

दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आग फिर न बुझी
यह दिल की लगी है दिल से लगी है
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है

चेहरे पर नज़रें रुकीं फिर पलकें झुकीं
होंठों पर नाम है आँखें सपने बुनती हैं
अफ़साने बनते हैं पन्ने भी खुलते हैं
मिटता है सब-कुछ ज़माने से सुनते हैं
कोहरे-से बिछते हैं दो दिल मिटते हैं
मोहब्बत के निशाँ बनते न मिटते हैं

दिल की लगी दिल को दिल से लगी
जब लगी यह आग फिर न बुझी
यह दिल की लगी है दिल से लगी है
जब यह लगी है फिर कहाँ बुझी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

यह रंगीन फ़िज़ा

यह रंगीन फ़िज़ा
बेरंग दिख रही है
सावन की बदली
तंग दिख रही है
एक मैं सिर्फ़ मैं
यहाँ बैठा रहता हूँ
बैठकर तेरा नाम
अपने साथ लेता हूँ
सदियाँ गुज़र गयीं
(ऐसा लगता है मुझको,
शायद कुछ ग़लत कह गया मैं,
लेकिन ऐसा ही है!!)
मौसम बदल गये
अरमाँ बदल जायें
अब तो लौट आ
अब तो लौट आ
मुझे तेरा इंतज़ार है
सिर्फ़ तेरा ही…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१