मेरी मोहब्बत को समझते हो तुम ग़लत

मेरी मोहब्बत को समझते हो तुम ग़लत, ग़लत नहीं है
तुमको चाहा है मैंने अगर इसमें कुछ ग़लत नहीं है

दिखा दो तुम कोई अपना-सा इस ज़माने में मुझको
मैं अगर फिर चाह लूँ उसको इसमें कुछ ग़लत नहीं है

आँखों को मेरी सुकून आया है तेरी हसीन सूरत देखकर
किसी चेहरे से सुकूनो-सबात पाना कुछ ग़लत नहीं है

मैं ने अगर देखा है तेरी आँखों में तो तूने भी देखा है
मोहब्बत की नज़र से किसी को देखना कुछ ग़लत नहीं है

डरते हो क्या तुम अपने-आप से या फिर जानकर किया सब
पहले प्यार में दिल का उलझ जाना कुछ ग़लत नहीं है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मेरा यह दर्द ख़त्म हो जाये कभी

मेरा यह दर्द ख़त्म हो जाये कभी
जो दुआ में तू मुझे माँग पाये कभी

टूट चुके हैं मेरी तमन्ना के दोश
तू ख़ुद संभाला देने को आये कभी

कबसे गया है न आया आज तक
मेरी आरज़ू तुझे खींच लाये कभी

ख़ुदाया मैं भटक रहा हूँ सहराँ में
कोई इस तस्कीं को मिटाये कभी

ग़मगीन शाम है और उदास हम
क्यों गुफ़्तगू का मौक़ा आये कभी

हमसे उल्फ़त किये बनती नहीं
मोहब्बत राहे-जुस्तजू पाये कभी

ख़स्ता हाल है दिल बहुत तेरे लिए
तुझे मजमूँ यह समझ आये कभी

तस्वीर मुझसे बात करती नहीं
तेरा यह दीवाना सुकून पाये कभी

तेरी कशिश भरी एक नज़र इधर
दिल पर अपना जादू चलाये कभी

तुम न जानो मेरे प्यार के बारे में
और ख़ुशबू तेरा पयाम लाये कभी

पहली नज़र से जो हसरत है मुझे
काश ख़ूबरू उसे समझ पाये कभी

दोश : कंधा, shoulder | मजमूँ : विषय, subject | ख़ूबरू : सुन्दर चेहरे वाला, beautiful


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

दरवाज़े पे चुप-चुप से वह बैठे हैं

दरवाज़े पे चुप-चुप से वह बैठे हैं
दबा के मेरे जैसे तन्हाई वह बैठे हैं

उनके दीदार से जो मुझे सुकून है
दिल में जाने क्या सोचकर वह बैठे हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

इल्तिहाबे-दर्द से जलता है कलेजा

इल्तिहाबे-दर्द से जलता है कलेजा
कभी तेरी यादों को बिखराया कभी सहेजा

बयाँ दास्ताने-सोज़े-फ़ुगाँ किससे करूँ
सभी मेरे लफ़्ज़ देखते हैं न कि लहजा

सुकूनो-क़रारो-सबात से क्या मुझे
तू इस दिल के सौदे में मेरा सब कुछ ले जा

सदाए-राहे-मुहब्बत बुलाती है मुझको
दिमाग़ कुछ सोच के कहता है ठहर जा

गर्मिए-हौसले-जुनूँ का असर है यह
दिल करता है मुझपे नवाज़िशहाए-बेजा

अब तक न मेरे सलाम का कोई जवाब आया
तूने मुझको कोई ख़त भेजा कि न भेजा

ख़्याले-सुम्बुल से बीमार की बेक़रारी है
ऐ तबीब ‘नज़र’ को इसका इलाज दे जा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

जब तक कोई आस उसे आकर पोंछ न दे…

ज़िन्दगी से सौ ग़म एक खु़शी मिलती है
अब तक जितनी राहों से गुज़रा हूँ,
ग़म उठाता रहा हूँ…
रूह छिलती रही है मेरी…

सीने की तह में…
जाने कितने ही ज़ख़्मों के टूटे शीशे और
घावों के जंग खाये हुए लोहे के टुकड़े जमा हैं
ज़रा दम भर को करवट लेता हूँ तो…
जोंक की तरह से सारे सबातो-सुकूँ चूसने लगते हैं

पलकें आँच के ग़ुबार से जल उठती हैं
आँख खुश्क और खुश्क होती जाती है
आँसुओं का इक सैलाब-सा उमड़ पड़ता है यकायक
दरिया बहता ही रहता है
जब तक कोई आस उसे आकर पोंछ न दे…

और खु़शी वह तो यक़ीनन तुम्हीं से है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४