बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा मोर मुकुट वाला
बजाये बाँसुरी श्रीकृष्ण हमारा
नाचूँ मगन नाचे वृंदावन सारा
राधा प्रेमी मीरा भी गोपाला
गोपियाँ पुजारन तेरी गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा कमल नयन वाला
कजरारी आँखें मधु का प्याला
इनसे कैसा जादू छलका डाला
सलोना रूप बरखा के घन-सा
और दमकत मुख चंद्रमा-सा

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा श्यामल तन वाला
गले में पड़ी प्रेम सुमन माला
प्रकृति का कण-कण मोह डाला
वह महंत सुन्दर हृदय वाला
छलका रहा करुणा का प्याला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से
इतनी दूरी क्यों है, यह मजबूरी क्यों है
इसका जवाब दो तुम इसका जवाब दो
यह जुदाई क्यों है यह रुसवाई क्यों है
इसका जवाब दो मुझे इसका जवाब दो

यह दिल मेरा तेरी मोहब्बत चाहता है
वह दिल तेरा मेरी मोहब्बत चाहता है
इस मुश्किल से थोड़ी राहत चाहता है

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से

ख़ाहिश है तू मेरी, जन्नत है तू मेरी
इस दुनिया में सबसे सुन्दर है तू ही
नीले आकाश में जैसे उड़ता बादल है
नील आँखों में जैसे सजता काजल है
कुछ यूँ मेरे दिल के अन्दर है तू ही
मेरी सजनी तू नील समन्दर है तू ही

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से

तुम मेरे जीवन में फिर आ जाओ
तुम मुझे एक बार अपना कह जाओ
फिर जो बोलोगे तुम हम कर जायेंगे
फिर तुम बोलोगे तो हम मर जायेंगे
पर ऐसी ज़िन्दगी हम न जी पायेंगे
तन्हा साँसें ले‍गें हम तन्हा मर जायेंगे

हल्के-हल्के आँसू टूटे हैं मेरी आँखों से
अब बात नहीं बनती है तेरी यादों से
इतनी दूरी क्यों है, यह मजबूरी क्यों है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

फिर क्यों दोनों तन्हा

एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों दोनों तन्हा
फिर क्यों दोनों तन्हा

मेरा मरहम है तू
मेरा मज़हब है तू
आँखों में तेरा ही चेहरा

कंचन भी तू है
चंदन भी तू है
दिल चाहे तेरा ही रहना

एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों दोनों तन्हा
फिर क्यों दोनों तन्हा

मन मन्दिर है तू
कितनी सुन्दर है तू
तेरे बिन लागे दिल ना

मेरा मंज़िल तू है
मेरा साहिल तू है
दिल चाहे तुझको पाना

एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों दोनों तन्हा
फिर क्यों दोनों तन्हा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९