जहाँ उस रोज़ देखा था तुम्हें [ver. 2.0]

बीते दिनों की गलियों में जब पाँव पड़ते हैं तो
अपने आपको तुझमें ढूँढ़ने लगता हूँ मैं
दिल के ज़ख़्म बर्फ़ की तरह जमने लगते हैं
और उदासियों की नज़्म उन्हें गरमाती रहती है…

मैं जानता हूँ पिछला कुछ भी बदला नहीं जा सकता
फिर भी ‘काश!’ की परछाईं मेरा पीछा नहीं छोड़ती
काश यूँ न होता, काश वैसा न किया होता, काश!
बस यही आवाज़ें मन में गूँजती रहती हैं…

सन्नाटों में झींगुर जाने किसको सदा देते हैं
चाँदनी ज़मीन पर जाने क्या ढूँढ़ती रहती है
मैं बंद कमरे में बैठा, खिड़की से बाहर देखता हूँ
तेरी यादें गली में टहलती नज़र आती हैं मुझे…

मेरी राह वही है जहाँ उस रोज़ देखा था तुम्हें
जब गुज़रता हूँ आँखें वही लम्हें ढूँढ़ती हैं
और हक़ीक़त के हाथ वहम के परदे उठा देते हैं
रह जाता दिल में गूँजता हुआ एक सन्नाटा…

मेरी ज़िन्दगी के पिछले सात पन्ने तुमने लिखे थे
जिनको मैंने अपने ख़ाबो-ख़्याल से सजाया था
कच्ची स्याही से लिखे वह लम्हों में बुने हर्फ़
लाख कोशिशों के बावजूद भूल नहीं पाया हूँ…

न मेरा नाम याद रखना, न मेरी चीज़ें सँभालना
न मेरी शक़्ल याद रखना, न मेरी वो बातें
तुम मुझे भुला दो बस यही दुआ करूँगा
याद आऊँ तो नाम न लेना फ़लाँ कह देना मुझे…

मुझको भूल जाने वालों को मैं भूल जाता हूँ
भीड़ में उनके चेहरे तक याद नहीं रखता मैं
तुम मेरा एक ख़ाब हो जिसे भूलना चाहता हूँ
और ज़हन से रोज़ यही इक बात उतर जाती है…

ख़ुदा तुम्हें मुझसे हसीन मुझसे ज़हीन कोई भी दे
और न दे तुम्हें तो कोई मेरे जैसा दीवाना
गो कि यकता हूँ मैं सारे ज़माने में
और तुम मुझ जैसा दूसरा ढूँढ़ नहीं पाओगी…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

एक गिरह ज़ुबाँ में

एक गिरह ज़ुबाँ में, सब के होती है
वक़्त लगते ही लफ़्ज़ अटका देती है
लोग क्या समझते हैं
मैं ना-पाक हूँ या मौक़ापरस्त!
अजब माहौल है, इस मेरी जा का
कि मीर जैसा ज़हन किसी का नहीं

एक मज़ाक़ लगता हूँ,
या लोग मुझको मज़ाक़ बनाते हैं
सामने कुछ-का-कुछ कह के
पीठ पीछे मुस्कुराते हैं…
सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है
हमें भी परखना है जहाँ,
चलो हर ज़ुबाँ की गिरह गिनते हैं
हलक़ से उतरे या न उतरे सच
हम बेफ़िक्र रहते हैं…

मेरे जानिब जो झुकते हैं,
मुझसे तरक़ीब रखते हैं…

‘मतलब से ही खुलते हैं ज़हन के दरवाज़े
मतलब से ही बंद होते है दिलों के कपाट
समझ कि तेरा यार कोई नहीं होगा-
वजहसार बन ‘नज़र’ तन्हा वक़्त काट’

यह पुरज़े जो उतरे हैं तेरी कलम से ‘विनय’
सफ़्हों पे उतर के खु़द बयाँ हुआ है तू… 

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

पिछला कुछ भी बदला नहीं जा सकता

बीते दिनों की गलियों में जब पाँव पड़ते हैं तो
अपने आपको तुझमें ढूँढ़ने लगता हूँ मैं
दिल के ज़ख़्म बर्फ़ की तरह जमने लगते हैं
और उदासियों की नज़्म उन्हें गरमाती रहती है…

मैं जानता हूँ पिछला कुछ भी बदला नहीं जा सकता
फिर भी ‘काश!’ की परछाईं मेरा पीछा करती है
काश यूँ न होता, काश वैसा न किया होता, काश!
बस यही आवाज़ें मन में गूँजती रहती हैं…

सन्नाटों में झींगुर जाने किसको सदा देते हैं
चाँदनी ज़मीन पर जाने क्या तलाश करती है
मैं बंद कमरे में बैठा खिड़की से बाहर देखता हूँ
तेरी यादें गली में टहलती नज़र आती हैं मुझे…

मेरा उसी राह से आना-जाना है जहाँ तुम्हें देखा था
आज भी नम आँखों में माज़ी की हरी काई जमी है
वहम ही सही मगर दो पल को तेरा साथ मिल जाता है
और तन्हाई के पन्नों पर तेरी तस्वीरें बन जाती हैं…

मेरी ज़िन्दगी में जितने भी सफ़्हे तुमने लिखे थे
उनके हर्फ़ आज भी मैं तन्हाई के साथ चुनता हूँ
कच्ची स्याही से लिखे वह लम्हों में बुने हर्फ़,
लाख कोशिशों के बाद भी मैं भूल नहीं पाया हूँ…

मेरा नाम भूल जाओगी, मेरे ख़त खो जायेंगे तुमसे
शक़्ल तक न याद आयेगी, न मेरी कोई बात
वक़्त की गर्द में तुम मेरे लिए आँखें मूँद लोगी
शायद कभी फ़लाँ कहकर भी न याद करो मुझको…

मुझको भूल जाने वाले लोगों को मैं भूल जाता हूँ
भीड़ में उनके चेहरे तक नहीं याद रखता मैं
तेरा चेहरा ही जानता था, नाम क्या होगा? परवाह न थी
तेरा नाम भूल जाऊँ शायद पर तुझे कैसे भूलूँगा…

मैं हसीन नहीं मगर वह तो फ़िल-हक़ीक़त हसीन होगा
जिसे तुम चाहती हो, जिसके लिए साँस लेती हो तुम
गो मैं यकता हूँ, ज़माने में मुझसा कोई दूसरा नहीं
फिर क्यों लगता है मुझे वह मुझसे बेहतर होगा…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

एक सफ़्हा

सुबह एक सफ़्हा, शाम एक सफ़्हा
दिन एक सफ़्हा, रात एक सफ़्हा

ज़िंदगी एक सफ़्हा,  साँस एक सफ़्हा
धूप एक सफ़्हा, छाँव एक सफ़्हा

खा़हिश एक सफ़्हा, आरज़ू एक सफ़्हा
खा़ब एक सफ़्हा, आँख एक सफ़्हा

बहार एक सफ़्हा, पतझड़ एक सफ़्हा
झूठ एक सफ़्हा, सच एक सफ़्हा

सूरज एक सफ़्हा, चाँद एक सफ़्हा
ग़ज़ल एक सफ़्हा, गीत एक सफ़्हा

खा़मोशी एक सफ़्हा, हँसी एक सफ़्हा
आँसू एक सफ़्हा, खु़शी एक सफ़्हा

दिल एक सफ़्हा, धड़कन एक सफ़्हा
जिस पर तेरी तस्वीर बनी है,
जिस पर तेरा नाम लिखा है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४