दर्द को दर्द का मरहम दे दे

दर्द को दर्द का मरहम दे दे
ऐ मौत न आने की क़सम दे दे

लगन यार की मन से जाये ना
दिल की तड़प काम आये ना
नहीं आता तो आने का वहम दे दे

मैं बिखर गया तेरे जाने के बाद
जाना प्यार तुझे खोने के बाद
मिलने का कोई वादा सनम दे दे

ऐ मौत न आने की क़सम दे दे…

मसला मुझे विरह की रातों ने
तोड़ा-जोड़ा मुझे बीती बातों ने
मेरी रूह को चैन हमदम दे दे

यह ख़ुमार अब आठों पहर है
ज़िन्दगी जैसे कोई ज़हर है
मुझको वही ख़ुशी का मौसम दे दे

ऐ मौत न आने की क़सम दे दे…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना

राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना
मगर हम शोलों पर भी चलकर जायेंगे
हमें तो चाह है तेरे इश्क़ की रोज़े-अव्वल से
तुम नहीं जानते क्या कर गुज़र जायेंगे

है हर गुल को छूने से तेरा लम्स हासिल
मगर यह चमन इक रोज़ बिखर जायेंगे
लम्हे यह बहुत उदास-उदास हैं तुम बिन
तुम आओगे रंगो-शाद से निखर जायेंगे

मेहरबानिए-इश्क़ कभी तुम हमसे निबाहो
हम बिगड़ी क़िस्मत हैं सँवर जायेंगे
मरना तो एक न एक दिन सबको है हमदम
जान लो तेरे इश्क़ की ख़ातिर मर जायेंगे

सदफ़ में गौहर की तरह दिल में तुम रहते हो
ज़ीस्त है तुमसे, तुम बिन ज़रर जायेंगे
ख़ातिर से अपने तुम नवाज़ दो हमको मेहरबाँ
तेरे दिल तक आँसुओं में बहकर जायेंगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा

क्योंकर प्यार न आये नरगिसी आँखों पर
क्योंकर गुल न महकाये बहार शाखों पर

इस दीवाने को दीवानगी सिखायी किसने
दिल में उसके यह आग लगायी जिसने

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा

किस क़ातिल अदा से तुमने तीर चलाया है
अपनी नज़रों से मेरा जिस्म महकाया है

क्योंकर शोलों पर चलने का ग़म होगा
जब तुम जैसा साथ कोई हमदम होगा

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा

इश्क़ की मय आँखों से पिला दी है तुमने
और जन्नत की रहगुज़र पा ली है हमने

वाक़िफ़ नहीं तू मेरी मोहब्बत से जाने-जाँ
तेरे साथ जो न गुज़रा वो लम्हा’ लम्हा कहाँ

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मेरी मोहब्बत है तू कहाँ

मेरी मोहब्बत, है तू कहाँ, तू कहाँ है
जिस्म यहाँ, जान कहाँ, जान कहाँ है

तड़प-तड़प कर साँसें जिस्म में पलती हैं
दिन-रात दिल की आहों में जलती हैं
यह मेरा नसीब है या वक़्त का क़तरा
थाम लिया है किसने अब तक न गुज़रा

मुझको आवाज़ दे है तू कहाँ, तू कहाँ है
मेरे हमदम, मेरे हमनवाँ, तू कहाँ है…

नीली शाम यह सूरज जब पिघलता है
गुलाबी चाँद दो बोझल आँखों में गलता है
पतझड़ को शाखों पर किसने सजाया है
टूटे हुए आइने में अक्स अपना दिखाया है

आ तू कभी मेरी बाँहों में आ, तू कहाँ है
मेरे हमसफ़र, मेरे हमनवाँ, तू कहाँ है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९ अप्रैल २००३