तेरे चेहरे पर ज़ुल्फ़ उड़ी तो शाम हुई

तेरे चेहरे पर ज़ुल्फ़ उड़ी तो शाम हुई
मेरी ख़ुशियों का मुझसे इंतकाम हुई

फ़ज़िरो-शाम1 तेरी उम्मीद’ तेरा तस्व्वुर2
तेरी यादों में यह शब3 भी तमाम हुई

मेरी मोहब्बत का यही होना था हश्र4
हर गली हर कूचा5 बहुत बदनाम हुई

भड़कने दो तुम तजुर्बों के शोले को
ज़ीस्त6 रोज़गार7 से यूँ ही बेदाम8 हुई

वो तेरा ज़ीस्त से लाग क्या हुआ ‘नज़र’
इक थी ज़िन्दगी’ सो उसके नाम हुई

शब्दार्थ:
1. सुबह और शाम, 2. ख़्याल, 3. रात, 4. अंजाम, 5. गली, 6. ज़िन्दगी, 7. दुनिया, 8. जाल से मुक्त


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ज़ख़्मे-जिगर भर आये, कहाँ हो तुम?

ज़ख़्मे-जिगर भर आये, कहाँ हो तुम?
बदरा सावन बुलाये, कहाँ हो तुम?

अपने हश्र तक पहुँचा ‘नज़र’ आज
मौत यह मुझको सताये, कहाँ हो तुम?


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

कितने दिन हुए

कितने दिन हुए कोई टूटता सितारा नहीं देखा
मेरे हश्र को एक यह बुनियाद और सही…

क्या तू अब भी मुझे अपनी दुआ में माँगती है?


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

तू संग न होगा

तू कर यह वादा भी मेरे अल्लाह तू संग न होगा
तू है भी अगर किसी बुते-संग में तू संग न होगा

तेरी मर्ज़ी से यह गुलशन वीरानो-गुल्ज़ार हैं
मैं दुआ करूँगा दमे-आख़िर तक तू संग न होगा

मेरी क़िस्मत में क्या बदा है एक तू ही जानता है
गर हुआ कभी मेरी दुआ का हश्र तू संग न होगा

जुज़ मेरे हर मुक़ाम पर इक मुक़ीम दिखता  है
मैं तन्हा खड़ा हूँ कब से राह में तू संग न होगा

मत कर फ़िक्र मेरे ‘वफ़ा’ यह तेरा अंजाम नहीं
दिल दुखते-दुखते भी कहता रहा तू संग न होगा

इस ग़ज़ल में संग एक उर्दू अल्फ़ाज़ है जिसका अर्थ पत्थर होता है|


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३