काश कि फिर वह सहर आती

काश कि फिर वह सहर आती
जब तू मुझे नज़र आती

तेरी आरज़ू है मुझे रात-दिन
कभी तू इस रहगुज़र आती

पलकें सूख गयीं राह तकते
तेरी कोई खोज-ख़बर आती

दरम्याँ रस्मो-रिवाज़ सही
तू फिर भी इधर आती

सहाब दिखे हैं सूखे दरया पे
कभी बारिश भी टूटकर आती

मौतें मरकर मैंने देखी हैं
कभी ज़िन्दगी मेरे दर आती

क़रार आ जाता पलभर के लिए
मेरे ख़ाबों में तू अगर आती

सहर: संध्या, सुबह, dawn, morning | सहाब: बादल, clouds


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

क्यों बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता

क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता
क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता
क्यों? ढल रहा हूँ दिल में ख़ुद के ही, आज!
क्यों नहीं हूँ कोशिशे-इश्क़ में, ख़ुद के ही आज?
मग़रूर तो हूँ मैं, मजबूर भी हूँ, ऐसा क्यों?
आज तक बेकसूर भी हूँ मैं, न जाने ऐसा क्यों?

पनाह दे दे, पाँव में किसी के जगह दे दे, मुझे
भटकता हुआ ख़ुद ही बीन रहा हूँ अपने टुकड़े!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
शाख़ों पर हैं नयी कोंपलें
जब से मौसमे-फ़ुर्क़त गुज़रा है

पुरवाइयाँ तन-बदन पे आग लगती हैं
तन्हाइयाँ मेरे ज़हन से ख़ौफ़ रखती हैं
निगाह में तस्वीरे-यार सजा ली जब से
रंगीनियाँ दिल को ख़ुशगँवार लगती हैं…

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
बेलों पर महके गुच्छे
जब से हुआ यह मौसम हरा है

मेरी बेक़रारियाँ आज क़रार पाने लगी हैं
यह धड़कनें तेरा नाम गुनगुनाने लगी हैं
इक अजब भँवर-सा उमड़ा है ख़्यालों का
ख़ाबों ख़्यालों की भीड़ राह पाने लगी है…

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
पैमाने सारे भर गये हैं
बादाख़ार हुआ यह दिल ज़रा है

सूरज है हुस्न उसका, जलाता है मुझको
बदन रेशमी चाँद जैसा, लुभाता है मुझको
तक़दीर जो उसने ‘ जोड़ ली है मुझसे
आज मौसम बहार का, बुलाता है मुझको…

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
मेरे लिए उसकी चाहत
आज तो उसका दिल भी ख़रा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तुम मेरी ज़िन्दगी मेरा क़रार

तुम मेरी ज़िन्दगी मेरा क़रार
हो गया मुझको तुमसे प्यार
तू आ जाये अगर मेरे क़रीब
तो खुल जायेगा मेरा नसीब
तुमको जिस दिन से देखा है
आँखों में तेरा ही चेहरा है…

तुम मेरी ज़िन्दगी मेरा क़रार
हो गया मुझको तुमसे प्यार

तेरी जुदाई हम सह न सकेंगे
तेरा नाम लब से न मिटायेंगे
भूल गया सारा जहाँ तेरे लिए
कर जाऊँगा कुछ भी तेरे लिए
रस्में तोड़ दूँ, दुनिया छोड़ दूँ
भूल जाओ ग़म इतना प्यार दूँ

तुम मेरी ज़िन्दगी मेरा क़रार
हो गया मुझको तुमसे प्यार


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

पहली बार देखा तुमको

पहली बार देखा तुमको
जाने क्या हुआ
दिल की धड़कनों का
हल्का-हल्का एहसास हुआ

डूब गया मैं तेरी आँखों में
जाने-मन जाने-जानाँ
तुमने मेरा चैन ले लिया
वह तेरी पहली नज़र
जाने-मन जाने-जानाँ
यह दिल मेरा खो गया

पहली बार देखा तुमको
जाने क्या हुआ
दिल की धड़कनों का
हल्का-हल्का एहसास हुआ

जब तक देखूँ न तुमको
दिल क़रार पाता नहीं
जाने कैसा तुमने जादू किया
जाने कैसा तुमने दर्द दिया

पहली बार देखा तुमको
जाने क्या हुआ
दिल की धड़कनों का
हल्का-हल्का एहसास हुआ

ढूँढ़ रहा था मैं गली-गली
जिसको बरसों से
आज मिली हो तुम
एक तस्वीर बनायी थी
मैंने अपने दिल में
आज मिली हो तुम

पहली बार देखा तुमको
जाने क्या हुआ
दिल की धड़कनों का
हल्का-हल्का एहसास हुआ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९