दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते

दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते
आँसू बहते हैं इतना छुपाये नहीं छिपते

होता है कभी, शाम आती है चाँद नहीं आता
मरासिम हम से यूँ निभाये नहीं निभते

ख़ुदा के आस्ताँ पे आज भी सर झुकाये हूँ
मगर दाग़े-दिल उसे दिखाये नहीं दिखते

हैं जो हमको ज़ख़्म’ सो तेरे तस्व्वुर से हैं
यह ज़ख़्म सीने से मिटाये नहीं मिटते


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

काश यह सन्दली शाम महक जाती

काश यह सन्दली शाम महक जाती
सबा* तेरी ख़ुशबू वाले ख़त लाती

तुझसे इक़रार का बहाना जो मिलता
मेरी क़िस्मत शायद सँवर जाती

दीप आरज़ू का जलता है मेरे लहू से
काश तू इश्क़ बनके मुझे बुलाती

दूरियाँ दिल का ज़ख़्म बनने लगीं हैं
होता यह नज़दीकियों में बदल जाती

सबा: ताज़ा हवा, breeze


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

पल भर को सही मेरे ज़ख़्मों को बुझाने के लिए आ

पल भर को सही मेरे ज़ख़्मों को बुझाने के लिए आ
आ तू कभी मुझको मोहब्बत सिखाने के लिए आ

पहले प्यार का रंग दिल पे बहुत गहरा चढ़ा है
तू कभी इस रंग में अपना रंग मिलाने के लिए आ

मेरी तरह तेरे दिल में भी होंगी कुछ बेइख़्तियारियाँ
इस इश्क़ के तूफ़ाँ में तू मुझको डुबाने के लिए आ

जितनी शिद्दत से मैंने तुझको रात-दिन चाहा है
उस तरह तू बाक़ी के दिन-रात महकाने के लिए आ

बे-मौत शबो-रोज़ मरता हूँ मैं तड़प-तड़प कर
तू कभी मुझको ज़िन्दगी के हुस्न दिखाने के लिए आ

मुझको क्या हासिल है तेरे प्यार में सिवाय फ़ुर्क़त
तू यह फ़ु्र्क़त की बद्-रंग शाम मिटाने के लिए आ

मुझमें हर तरह क़हर नाज़िल हैं बद्-नसीबियों के
तू कभी मेरी तक़दीर की शम्अ जलाने के लिए आ

जो तुझको बिना बताये छोड़कर चला गया है ‘नज़र’
उसको क़सम दे, कह कि तू कभी न जाने के लिए आ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उस्लूब, उस्लूब, उस्लूब

उस्लूब*, उस्लूब, उस्लूब
क्या पढ़ने वाले इनको समझते हैं
वज़नी हो सीने पर गर ज़ख़्म
उसे पढ़ने वाले दर्द को समझते हैं

* लेखन के नियम अथवा शैली


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

इक बार तेरा चेहरा फिर देख लूँ

इक बार तेरा चेहरा मैं फिर देख लूँ
यह उम्मीद तू बता मैं कैसे छोड़ दूँ

आ फिर आ जा इक बार फिर आ जा
सूखी आँखों से टूटे हैं टुकड़े आँसू के
मैं न कहूँगा कि तू मेरी हो जाये
तस्वीर सजाऊँ आँखों में तू जो आये

चले जाना हाँ बड़े शौक से तुम
मेरा दिल तोड़ के, इक बार आ जा
बोलते हुए कई चेहरे सुने हैं मैंने
किस तरह मैं उनसे बात कर लूँ

इक बार तेरा चेहरा मैं फिर देख लूँ
यह उम्मीद तू बता मैं कैसे छोड़ दूँ

अब के आना तो बस इक शाम
बैठी रहना रू-ब-रू, रू-ब-रू
ना कुछ कहना ना सुनना
पढ़ते रहना मेरी आँखों की ख़ुशबू

आ जा इक बार, लौट के आ जा
फिर दिल मेरा तोड़ के चली जा
इक बार आ जा, बस इक बार आ जा

कभी ख़ाब में न आना तुम
मगर कभी यादों से न जाना तुम
बस इक यही ख़्वाहिश है
मेरा दिल इक बार फिर तोड़ जा

अरमानों की डोलियाँ जला दे तू
यह ना उठें कभी ख़ाली सीने से
देखो न रोकना तुम कभी मुझे
तन्हाई पीने से, रातों में रोने से

मेरे सीने के ज़ख़्म हरे करने की
कोई नयी तरक़ीब तू ढूँढ़ के ला,
मैं पैतरे तेरे सब जानता हूँ…

इक बार तेरा चेहरा मैं फिर देख लूँ
यह उम्मीद तू बता मैं कैसे छोड़ दूँ

यह नज़्म नहीं बयाने-हाल है मेरा
तेरे सिवा किसी और तस्वीर को
तू बता मैं कैसे अपना मान लूँ…

माटी-माटी कर दे मुझे दफ़्न करके
और जियूँ तो मैं जियूँ किस तरह से

क्या चाहती हो क्यों छोड़ा है मुझे
माना मैं तेरा अपना नहीं मगर
सब कुछ ख़ामोशी क़ुबूल करता हूँ
मैं कब तुझे ख़ुद से दूर करता हूँ

आ जा इक बार आ जा फिर आ जा
मेरा दिल इक बार फिर तोड़ जा
इक बार फिर छोड़ जा मुझको अकेला
तू इन राहों पर, इन्हीं गलियों में…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३