तेरे चेहरे पर ज़ुल्फ़ उड़ी तो शाम हुई

तेरे चेहरे पर ज़ुल्फ़ उड़ी तो शाम हुई
मेरी ख़ुशियों का मुझसे इंतकाम हुई

फ़ज़िरो-शाम1 तेरी उम्मीद’ तेरा तस्व्वुर2
तेरी यादों में यह शब3 भी तमाम हुई

मेरी मोहब्बत का यही होना था हश्र4
हर गली हर कूचा5 बहुत बदनाम हुई

भड़कने दो तुम तजुर्बों के शोले को
ज़ीस्त6 रोज़गार7 से यूँ ही बेदाम8 हुई

वो तेरा ज़ीस्त से लाग क्या हुआ ‘नज़र’
इक थी ज़िन्दगी’ सो उसके नाम हुई

शब्दार्थ:
1. सुबह और शाम, 2. ख़्याल, 3. रात, 4. अंजाम, 5. गली, 6. ज़िन्दगी, 7. दुनिया, 8. जाल से मुक्त


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना

राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना
मगर हम शोलों पर भी चलकर जायेंगे
हमें तो चाह है तेरे इश्क़ की रोज़े-अव्वल से
तुम नहीं जानते क्या कर गुज़र जायेंगे

है हर गुल को छूने से तेरा लम्स हासिल
मगर यह चमन इक रोज़ बिखर जायेंगे
लम्हे यह बहुत उदास-उदास हैं तुम बिन
तुम आओगे रंगो-शाद से निखर जायेंगे

मेहरबानिए-इश्क़ कभी तुम हमसे निबाहो
हम बिगड़ी क़िस्मत हैं सँवर जायेंगे
मरना तो एक न एक दिन सबको है हमदम
जान लो तेरे इश्क़ की ख़ातिर मर जायेंगे

सदफ़ में गौहर की तरह दिल में तुम रहते हो
ज़ीस्त है तुमसे, तुम बिन ज़रर जायेंगे
ख़ातिर से अपने तुम नवाज़ दो हमको मेहरबाँ
तेरे दिल तक आँसुओं में बहकर जायेंगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा

वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

नम है नफ़स-नफ़स मेरे सीने में
क्यों खर्च नहीं होती साँस जीने में

मेरी बाक़ी ज़िन्दगी का तुम ही सहारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

नामे-इश्क़ जायेगा मेरा सब-कुछ
क़िस्मत क्यों नहीं कहती आज कुछ

नाख़ुदा कश्ती को कब मिलेगा सहारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

‘नज़र’ को नयी ज़ीस्त दी तुमने शीना
जीने का तुमने सिखाया मुझको क़रीना

तेरे ही साथ मैंने हर लम्हा गुज़ारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

वज़नी: heavy; नफ़स: breath; नाख़ुदा: boater, sailer;
ज़ीस्त: life; शीना: shine; क़रीना: style


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला
मुझको हर गाम नीचा दिखाके क्या मिला
हर वक़्त इम्तिहान और बस इम्तिहान
मुझको राहे-ख़ुदा में और कुछ भी न मिला

ख़ाली सीने में दर्द ही ज़मीं दर्द ही आसमाँ
दूर तक राहों में दर्द के निशाँ बस निशाँ
बाहर आ गया जिगर फाड़ के क़तराए-लहू
ऐ ख़ुदा तूने दिया मुझको किस बात का सिला

हँसना मुझे रक़ीब का’ तीर-सा लगता है
रखे अगर वह बैर मुझसे रखता है
जाने उसकी आँखों में मैं खटकता हूँ कि नहीं
ऐ ख़ुदा हर बार मैं ही क्यों मूँग-सा दला

राहे-इश्क़ में मुझे पत्थर का दिल नहीं
ज़ीस्त यह गँवारा मुझे बिल्कुल नहीं
मैं ख़ुदा को किसका वास्ता देकर कहूँ कि बस!
ख़ुदा-ख़ुदा कहने से हासिल कुछ भी न मिला

अपने ज़ख़्मों पे ख़ुद आप मरहम रखूँ
यह दर्द अगर कहूँ तो आख़िर किससे कहूँ
बात-बात पे ख़ुद से बिगड़ना आदत बन गयी
दरबारे-ख़ुदा से मुझको कुछ भी न मिला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ख़लिश को जगह न दो दिल में

ख़लिश को जगह न दो दिल में
नासूर बन जायेगी
मरहम भी न लगा पाओगे
साँस घुट के मर जायेगी
ज़ीस्त अलग है, ज़ीस्त जीना अलग
समझे ‘नज़र’!
मजलिस में बैठोगे वाइज़ के साथ
बाँह खुल जायेगी…

ज़ीस्त= जीवन, Life


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३