थोड़ी कशिश तुझसे, थोड़ा क़रार रहने दे

थोड़ी कशिश तुझसे’ थोड़ा क़रार रहने दे
पागल दिल को ज़रा बेइख़्तियार रहने दे
thoRii kashish tujhse’ thoRaa qaraar rahne de
paagal dil ko zaraa be-ikh.ti’yaar rahne de

दीन जुदा हैं अगर तो क्या हुआ, मेरे रब्बा
दिल की तड़प का हल्का-सा ख़ुमार रहने दे
deen juda hain agar to kyaa huaa’ mere rabba
dil kii taRap ka halkaa-sa kh.umaar rahne de

तुम्हें हँसकर कभी देखा न जाये है मुझसे
दिल में अपने जलन की ये शरार रहने दे
tumhein ha’nskar kabhii dekhaa na jaaye hai mujhse
dil mein apne jalan kii ye sharaar rahne de

मैं तेरा हो नहीं सकता, ज़ख़्म सुलगते हैं
अच्छा है, मेरे दिल को सोगवार रहने दे
main teraa ho nahii’n sakta, zakh.m sulag’te hain
achchha hai, mere dil ko sog’vaar rahne de

ज़िद करना तेरे हक़ में अब नहीं रहा, गोया
दिल हल्का हो गया लेकिन ग़ुबार रहने दे
zid karna tere haq me ab nahii’n raha, goya
dil halka ho gaya lekin ghubaar rahne de

बहस न छेड़ बढ़ती जायेगी, इश्क़ अक़ीदत है
वाइज़, मुझमें हक़ीक़त ये शुमार रहने दे
bahas na chheR baDh.tii jaayegii, ishq aqeedat hai
vaa’iz mujh mein haqeeqat ye shumaar rahne de

ज़ुल्म सहे फिर भी ख़ामोशी रही दुआ बनकर
तुझ पर जान कुछ मेरा ऐतबार रहने दे
zulm sahe phir bhii kh.moshii rahii duaa ban’kar
tujh par jaan kuchh meraa ai’tbaar rahne de

मैं ख़ुद से किनारा करके जुदा रहा ख़ुद से
अच्छा है, अगर वो बाहम दरार रहने दे
main kh.ud se kinaara karke juda rahaa kh.ud se
achchha hai, agar wo baaham daraar rahne de

चश्म मेरी तर रहे उसने यही दुआ की थी
वो दुश्मन हुआ है’ दिल उस्तुवार रहने दे
chashm merii tar rahe usney yahii duaa kii thii
wo dushman huaa hai’ dil ustu’waar rahne de

वो नज़दीकियाँ रखता है भले ही मतलब से
लेकिन तू उसे मेरा ग़मगुसार रहने दे
wo nazdeekiyaa’n rakhta hai bhale hii matlab se
lekin tuu usey meraa ghamgusaar rahne de

वो मिलकर न मिल पाया है मुझे, ख़ुदा है क्या
आमद का ‘नज़र’ उसके इश्तिहार रहने दे
wo milkar na mil paaya hai mujhe, kh.udaa hai kya
aamad ka ‘Nazar’ uskey ishti’haar rahne de

बहर/Baher: 2112 1112 2212 1222

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शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
कृतिकाल: 20:12 29-08-2013
Poet: Vinay Prajapati ‘Nazar’
Penned: 20:12 29-08-2013

तो उसका ये डर मिटे

बहुत दिन हुए ढलती रात पे सहर का सुनहरा रोगन मैंने चढ़ते नहीं देखा। तुम थे तो तुम्हें देखने के लिए इसे रोज़ बालिश्त-बालिश्त खेंचता था। उतरती थी धीरे-से रात, चाँद भी अलविदा कहके सूरज की किरनों में खो जाता था। तुम जब नहीं तो इन सब में मेरा दिल नहीं लगता… बदन में कुछ ज़ख़्म हैं जो साँस लेते रहते हैं। तुम्हारे जाने से जो हालत हुई है अब उससे उबरना चाहता हूँ मैं…। चाहता हूँ कि खुले आसमाँ के परों के नीचे बदन को साँसों से जाविदाँ कर दूँ। मगर जो ज़ख़्म वक़्त ने बुझाये हैं उन्हें लोग अपने नाख़ूनों से नोंच-नोंच के हरा कर देते हैं। आँखें लहू में भीग जाती हैं, साँस बदन में लहू-लुहान उतरती है, चुभती है सीने में एक निश्तर की तरह, मैं बस तड़प के रह जाता हूँ। चीखता हूँ… कोई सुनता नहीं इस बेकसी की पुकार को। चाहत है मुझे कोई साँस दे दे, ऐसी साँस जिसमें दोस्ती की ख़ुशबू हो, मेरे हाथों में अपना हाथ दे दे जिसमें उम्मीद का हौसला हो। क्या तुम बिन इस दुनिया में कोई ऐसा नहीं… जो तुम्हारी कमी को पूरा कर दे, ये सोती हुई कुछ पाने की हवस को ज़िंदा कर दे। तुम नहीं मिलती तो क्या अपनी घुटन में ख़ुद के साथ-साथ मैं अपनी तमन्नाओं का गला भी घोंट दूँ? ये कहाँ तक सही है, तुम कुछ कहती क्यों नहीं? तुम नहीं मिलती तो ये दुआ करो कि मुझे कोई तुमसा दूसरा मिल जाये। मैं तुम्हारी ख़ुशी से ख़ुश हूँ तो तुम्हें मुझसे जलन क्यों है? किसी तरह तुम मेरा साथ दे दो। यूँ घुट-घुटके मुझसे अब और नहीं जिया जाता, निजात दे दो मुझे निजात…। अपने लिये न सही, मेरे अपनों के लिए, जिन्हें मुझसे उम्मीदें हैं। दूसरों के ज़ख़्म ढोते-ढोते, इक छाती सहलाने वाले हाथ की ज़रूरत मुझे भी महसूस होने लगी है। अब बस और नहीं हारना चाहता, जीतने का कोई बहाना चाहता हूँ यानि किसी बहाने तो जीतना चाहता हूँ, अपने लिए न सही अपनों के लिए। तुम-सी तो नहीं मगर फिर भी वो मुझे जीता सकती है, ऐसा ही लगता है। कुछ तो था जो उसमें जो मैं उसकी तरफ़ बेबस-सा होकर बस खिंचता ही चला गया। कहा भी उससे हाले-दिल, ख़ुतूत में लिखकर भी दिया उसे। उसकी हाँ सी लगती है मगर वो डरे-डरे कँप कँपाते होंठों में दबी-सी है। शायद रूबरू कुछ किसी वादे के साथ कहूँ तो उसका ये डर मिटे… काश! कह सकूँ कोई ये मौका दे दे।

[Dead Letter] to SS

Penned on 02 जनवरी 2005