धीरे-धीरे ग़म सहना

धीरे-धीरे ग़म सहना,
किसी से कुछ न कहना
फ़ितरत ऐसी हो गयी,
दिन-रात मरके जीना


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

जो मुझको जानते हैं

जो मुझको जानते हैं ज़रा कम जानते हैं
जो नहीं जानते हैं ज़रा ज़्यादा जानते हैं

जो ढीठ बनके बैठा हुआ है मेरी जानिब
वो नहीं जानता है कि बहुत ढीठ है ‘विनय’

यह एक दिन न ढलेगा, ढलेंगे लाखों सूरज
देखता हूँ कब तक बैठोगे फेरके अपनी सूरत

बस शिकन में छुपा लोगे तुम अपनी चाहत
मगर कैसे छुपाओगे इक तड़प की हालत

ख़ुद से थोड़ा मुतमइन हूँ और तुझसे भी
जाने क्या बात है तुम कुछ कहते नहीं

देखता हूँ शर्त तू जीतेगी या मैं जीतूँगा
न हारना तेरी फ़ितरत में होगा न मैं हारूँगा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

वह दिल में एक मस्जिद है

वह दिल में एक मस्जिद है
जिसमें रोज़ नमाज़ अदा करता हूँ
वह मन मन्दिर की देवी है
जिसकी साँझ-सवेरे पूजा करता हूँ

मैं ख़तावार हूँ गुनाहे-इश्क़ का
उसके दर पे रोज़ सजदे करता हूँ
वह संगदिल है नरम दिल भी
अपनी जान उसके सदक़े करता हूँ

मैंने उसके नाम से जीना जाना है
मैं बेपनाह उससे मोहब्बत करता हूँ
सारे जहाँ में वह ख़ुदा है मेरा
मैं सिर्फ़ उसकी अक़ीदत करता हूँ

मैं तलबगार हूँ उसके दिल का
अपना यह दिल उसके नाम करता हूँ
वह सिर्फ़ो-सिर्फ़ मेरा है बस
मैं हर मुक़ाबिल को पैग़ाम करता हूँ

” कोई एक भी नहीं मुझसा ज़माने में
  एक दौर गुज़ार दोगे आज़माने में
  हर हाल में जीतना मेरी फ़ितरत है
  सौ उम्र लगा दोगे मुझको मिटाने में “


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ग़म देना उनकी फ़ितरत

ग़म देना उनकी फ़ितरत में शामिल होगा
मेरी फ़ितरत तो मुहब्बत देने की रही है

दूर रहना उनकी आदत में शामिल होगा
मेरी आदत तो ख़ुशबू लुटाने की रही है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१