हम में जीतने का हौसला है

हम में जीतने का हौसला है ‘नज़र’
यह बाज़ी भी हम मारकर जायेंगे

यह ज़ख़्म जाविदाँ नहीं रहने वाले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

क़लक़ इक हनोज़ है दिल में

आतिशे-दोज़ख़ का सोज़ है दिल में
आहो-फ़ुगाँ खा़मोश है दिल में

मैं दीदारे-दिलनशीं को बेताब हूँ
क़लक़ इक हनोज़ है दिल में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४

क़तरा-क़तरा गलायेगा मेरे दिल को

आज महसूस किया मैंने
गर तुम्हें किसी और के साथ देखूँ
तो मेरे दिल पे क्या गुज़रेगी
कैसा महसूस करूँगा बाद उसके…

काँच-से कच्चे खा़ब किस तरह चूर होंगे,
किस तरह बिखरेंगे, छिटकेंगे मेरे ज़ख़्मों पर
मानिन्द काँच के टुकड़ों के…
अश्कों का खा़रापन किस तरह ज़ख़्मों से
मवाद बनके बहेगा
क़तरा-क़तरा गलायेगा मेरे दिल को
किसी लाश की तरह,
जिसे दर्दों की तह में
वक़्त की मिट्टी तले दबा दिया गया हो

आज महसूस किया मैंने एक डर
तेरी फ़ुरक़त का डर
तेरे दूर होने का डर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४