तन्हाई में भी हम दोनों साथ हैं

तन्हाई में भी हम दोनों साथ हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं

वह पहली शाम जब देखा था तुम्हें
मैं आज तक भूला नहीं हूँ
वह पहली झलक’ वह पहली हँसी
मैं आज तक भूला नहीं हूँ

दूर होकर भी हम-दोनों साथ हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं

तुम जो आती थी’ तुम जो जाती थी
जैसे उड़ते बादलों में चाँद छिपता है
आती है बहुत तेरी याद मुझे
जब उड़ते बादलों में चाँद छिपता है

उलझे हुए दोनों के जज़्बात हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं

तुम याद आती हो मुझे इस तरह
मैं ख़ुद को भी भूल गया हूँ
तेरे सपनों में खोया हूँ आठों पहर
सारा ज़माना भूल गया हूँ

दो अन्जान मुसाफ़िर जो साथ हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है
जब तुम हो फिर किसकी ज़रूरत है

देखो नीले आसमाँ पर चाँद खिल गया
सनम मुझको जब तेरा साथ मिल गया
अब रात-दिन आँखों में तेरी सूरत है
आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

रंग-बिरंगे फूल, हर-सू खिलते हैं
जब दो प्यार करने वाले मिलते हैं
आ प्यार करें, क्या ख़ूब महूरत है
आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

उस दिन जब तुम गुलाबी लिबास में थी
यूँ लगा जैसे कोई कली ख़ुशबाश में थी
तेरे लिए दिल में हर पल अक़ीदत है
आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

मेरी नज़र ने सनम जो तुझे छू लिया
एक अजनबी-सा ख़ाब सच कर लिया
अब यूँ ही होती मुझको मसर्रत है
आज यह दुनिया बहुत ख़ूबसूरत है

मसर्रत: ख़ुशी, happiness । हर-सू: सभी तरफ़, in vicinity


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

शाम यह प्यासी रहती है पल-पल

शाम यह प्यासी रहती है पल-पल
भीनी-भीनी उदासी रहती है पल-पल

न हँसती है. न रोती है. यह शाम कैसी है?
तेरी यादों में डूबी रहती है पल-पल

रंग सारे सिमटने लगे हैं लकीरों में
शाम बेरंग फ़ीकी रहती है पल-पल

ख़ामोश है क्यों, वह उदास है क्या?
शाम आँखों में भीगी रहती है पल-पल

चाँद की ख़ुशियाँ शाम के दर्द मत पूछो
टूटी-बिखरी हुई रहती है पल-पल

मैं यानि ‘नज़र’ ही जाने सबब जीने का
मौत तो आती-जाती रहती है पल-पल


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

देखे जिसे कोई हसरतों से ऐसा तो नहीं हूँ मैं

देखे जिसे कोई हसरतों से ऐसा तो नहीं हूँ मैं
अक़ीदत करें जिसकी वह ख़ुदा तो नहीं हूँ मैं

माना यकता हूँ मेरे जैसा कोई दूसरा नहीं
फिर भी हर मायने में पहला तो नहीं हूँ मैं

जी रहा हूँ अब तक बिन तेरे तन्हा-तन्हा
जो असरकार हो जाये वह सदा तो नहीं हूँ मैं

क्यों न थके मेरी ज़बाँ कहते-कहते सबको अच्छा
कोई बातिल कोई पारसा तो नहीं हूँ मैं

न लड़ मुझसे मेरे रक़ीब इल्तिजा है तुझसे
जो आते-आते रह जाये वह क़ज़ा तो नहीं हूँ मैं

यक़ीनन वह बेहद ख़ूबसूरत है ‘नज़र’
वह न मिले मुझे इतना भी बुरा तो नहीं हूँ मैं

अक़ीदत:Adore, Affection | यकता: Matchless, Incomparable
बातिल: Void, झूठा । पारसा: महात्मा, Saint | रक़ीब:enemy | क़ज़ा:Death


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आज फिर मुझको खिड़की से

आज फिर मुझको खिड़की से
दिख रहा है चाँद आधा-आधा
जिस तरह से मैं जी रहा हूँ
वो भी कहीं जी रहा है आधा-आधा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३