ॐ शक्ति है

ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है

ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में

ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है

ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में

ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है

ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

किसने पहचाना ‘नज़र’ तुम्हें भूलने के बाद

ज़िन्दगी से दर्द’ दर्द से ज़िन्दगी मिली है
ज़िन्दगी के वीराने में तन्हाई की धूप खिली है

मैं रेत की तरह बिखरा हुआ हूँ ज़मीन पर
उड़ता जा रहा हूँ उधर’ जिधर की हवा चली है

मैं जानता हूँ उसका चेहरा निक़ाब से ढका है
महज़ परवाने को लुभाने के लिए शम्अ जली है

बदलता है वो रुख़ को चाहो जिसे जान से ज़्यादा
मेरी तो हर सुबह’ दोपहर’ शाम यूँ ही ढली है

आज देखा उसे जिसे कल तक दोस्ती का पास था
आज देखकर उसने मुझे अपनी ज़ुबाँ सीं ली है

किसने पहचाना ‘नज़र’ तुम्हें भूलने के बाद
अब तन्हा जियो तुमको ऐसी ज़िन्दगी भली है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

यादों का सागर

यादों का सागर
गहरा है
उसमें डूब जाऊँ तो
वक़्त का हर लम्हा
ठहरा है
कोई काँटा-सा है
जो लग गया है
इक फाँस-सा है
और फँस गया है
कोई आवाज़
हमें देता नहीं
क्या वो मकान
वीराँ हो गया है
क्या शाखों पर
गुल खिलते नहीं
या हवाओं का
रुख़ बदल गया है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२