फिर वही दर्द, वही शाम है

फिर वही दर्द, वही शाम है
लबों पर फिर तेरा नाम है

ज़िन्दा हूँ पर ज़िन्दगी नहीं
सीने में साँसों का ताम-झाम है

नतीजा-ए-इम्तिहाँ कुछ नहीं
मेरा यह कैसा अन्जाम है

मंज़िल से है अब तलक फ़ासला
मेरी हर कोशिश नाकाम है

मुझको न पसन्द आया कोई
तेरे दिल में मेरा मुक़ाम है

कहिए दिलो-जाँ क्या चाहिए
‘नज़र’ तो आपका ग़ुलाम है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

अजब-सी टीस लगी है

अजब-सी टीस लगी है
दस दूनी बीस लगी है,
आँखों में आँच भरी है
उन्नीस की बीस लगी है

दिल में दर्द उगते हैं
साँसें ठण्डी-ठण्डी हैं,
मेरा हर ख़ाब टूटा है
ख़ाहिश भीख लगी है

डालों से फूल गिर गये
ख़ुशबू के मौसम गये,
आइनों ने धोखा दिया
ज़िन्दा तस्वीर लगी है

रोशनी का दरिया बहे
मुझे कोई अपना कहे,
वह ख़लिश बुझाये तो
ज़िंदगी मरीज़ लगी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

ॐ शक्ति है

ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है

ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में

ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है

ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में

ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है

ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

सदफ़ है आँख और आँसू हुए गौहर

सदफ़ है आँख और आँसू हुए गौहर
देखिए कहाँ ले जाके डबोयेगा भँवर

अश्को-लहू के विसाल से दरिया है
भिगो रही है पैराहन को इक लहर

यह शाम ढल के शब न हुई ऐ चाँद
तदबीर कोई आके बता जाये सहर

रूह जिस्म में जो ज़िन्दाँ है ‘नज़र जी’
निकलती है देखिए कैसे किस पहर

सदफ़: oyster, seashell; गौहर: perl; विसाल: meeting, union;
पैराहन: cloth; शब: night; तदबीर: trick; सहर: dawn; रूह, soul


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३