उसने हमसे कभी वफ़ा न की

उसने हमसे कभी वफ़ा न की
और हमने भी तमन्ना न की

बहुत बोलते हैं सब ने कहा
सो आदत-ए-कमनुमा न की

बहुत आये बहुत गये मगर
जान किसी पर फ़िदा न की

उसने कही और हमने मानी
उसकी कोई बात मना न की

ख़ता-ए-इश्क़ के बाद हमने
फिर कभी यह ख़ता न की

बात थी सो दिल में रह गयी
सामने पड़े तो नुमाया न की

जिससे मुँह फेर लिया हमने
फिर कभी बात आइंदा न की

उम्मीद मर गयी सो मर गयी
वह बाद कभी ज़िन्दा न की

चोट दोस्ती में खायी है ‘नज़र’
किसी से नज़रे-आशना न की


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया

यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया अबकि बार
यह गरज मुझे डराती रही तेरे तेवर की तरह

बदलना था तुम्हें तो मुझको तुमने बदला क्यों
हमने ग़म को पहना है दिल पे ज़ेवर की तरह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मेरी आँखों पर जो था

मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँचल था
वह तेरी लटों का लहराना चाँद पे उड़ता बादल था
मुहब्बत के ज़हरीले तीर जो तुमने चलाये
तिश्ना लबों पर प्यास का क़तरा कितना बेकल था

वह गीले गुलाबी लब तेरे कितने नशीले थे
तेरी नख़्वत से हाए! हुए कितने रोबीले थे
देखा तो देखता ही रह गया तेरे यह आशिक़
तेरा चेहरा झील में खिलता हुआ ताज़ा कँवल था

मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँचल था
वह तेरी लटों का लहराना चाँद पे उड़ता बादल था

जब भी निकलती हो सामने से मुस्कुराके निकलती हो
क्यों न हो दर्द मीठा-मीठा बर्क़ गिराती चलती हो
तुमको कोई और चाहता है मेरी चाहत हुई बेअसर
मेरे दर्दो-दिल का हर टुकड़ा एक नयी ग़ज़ल था

मेरी आँखों पर जो था तेरी ख़ुशबू का आँचल था
वह तेरी लटों का लहराना चाँद पे उड़ता बादल था

तिश्ना= प्यासा, नख़्वत= नखरा, नाराज़गी, बर्क़= बिजली


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००२

मोती दो’ साथ पिरोना और

मोती दो’ साथ पिरोना और
लड़ना और बिगड़ना और

बात अलग है तन्हा जीना
तन्हाई से बातें करना और

आधी-आधी कहते हैं सब
हिचकना और झिझकना और

रहते तो हैं साथ मगर
प्यार की बातें करना और

बिगड़ना= anger, लड़ना= fight, हिचकना= tardiness, waver
झिझकना= shyness


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

दिले-सहरा में यह कैसा सराब है

दिले-सहरा में यह कैसा सराब है
ज़ख़्म मवाद है आँख मेरी बेआब है

क्यूँ इश्क़ ख़ौफ़ खा रहा है हिज्र से
नस-नस में मेरी कोई ज़हराब है

सुलगते हैं तेरे ख़्याल शबो-रोज़
गलता हुआ तेज़ाब में हर ख़ाब है

जुज़ बद्र कौन मेरा रक़ीब जहाँ में
मेरी ख़ाहिश को लाज़िम कैसा नक़ाब है

भटकती है नज़र किसकी राह में
उल्फ़त को मेरी क्या-क्या हिसाब है

ज़िन्दगी कब शक़ खाती है मौत से
मौत को भी ज़िन्दगी से क्या हिजाब है

हर्फ़ मेरे और तसलीम नहीं देते
कि ‘नज़र’ को दर्द से क्या इताब है

सराब= मरीचिका, Mirage, बेआब= सूखी, ज़हराब= ज़हरीला पानी, जुज़= केवल
बद्र= पूरा चाँद, रक़ीब= दुश्मन, हिजाब=पर्दा, शर्म, इताब= गुस्सा, Rebuke


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३