जो इश्क़ की आग भड़क उठी है

जो इश्क़ की आग भड़क उठी है
जैसे मैं शोलों में जल रहा हूँ

तेरे बदन की कशिश का है जादू
देखकर तुझ को मचल रहा हूँ

मुझे है ख़ाहिशो-तमन्ना1 तेरी
मैं उम्मीद को मसल रहा हूँ

एक यह ख़ाब मैं देखता हूँ कि
तेरी मरमरीं बाँहों में पिघल रहा हूँ

शब्दार्थ:
1. ख़ाहिशो-तमन्ना: इच्छा और चाह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उदास शाम है और आँखों में नमी है

उदास शाम है और आँखों में नमी है
मैं बहुत तन्हा हूँ तेरी कमी है

आँखें हैं आँसुओं का एक समन्दर
दिमाग़ में यादों की बर्फ़ जमी है

बह रहा है वक़्त बहुत तेज़
ख़ाली सीने में इक साँस थमी है

क्या जला है शबभर ख़्यालों में
शायद मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

मुक़र जाता है ख़ुदा अपनी बात से
क्या वह भी कोई आदमी है?

मेरे प्यार को गर न मिलें तेरी बाँहें
तो मौत ही मुझको लाज़मी है

जो देखकर मुस्कुराते हैं मुझको
उनके मन में गहमागहमी है

सर्द बहुत बढ़ गयी है दिल में
ऊदी-ऊदी धूप बहुत सहमी है

क्या बुझाता रहा हूँ आज सारा दिन
क्यों दर्द की छुअन रेशमी है

किसी चोट से मेरा दिल टूटा नहीं
तेरी यादों से हुआ ज़ख़्मी है

मैंने उफ़क़ में ढूढ़े हैं तेरे रंग
शफ़क़ आज कुछ शबनमी है

सूखे हुए कुछ फूल पड़े हैं ज़मीं पर
फूलो-शाख़ का रब्त मौसमी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

गोरी, आज यह सिंगार किसके लिए है

गोरी, आज यह सिंगार किसके लिए है
गुलाबी अंगों में निखार किसके लिए है
क्या सजन जी से मिलने का कोई वादा है
कहो ना हमसे आज क्या इरादा है…!

लटों की’ यह शरारत किसके लिए है
दिन-रात इतनी चाहत किसके लिए है
आज रात बलम जी को दीवाना कर दोगी
तीरे-नज़र का निशाना कर दोगी…

पूनम है आज की शब’ तेरे रंग से
खिल-खिल जाओगी पिया जी के संग से
मीठी-मीठी आज उनसे बतियाँ बनाओगी
उलझी-उलझी बाँहों में’ रतियाँ बिताओगी

गोरी का आज यह सिंगार पिया के लिए है
गुलाबी अंगों में निखार पिया के लिए है
हाँ-हाँ सजन जी से मिलने का कोई वादा है
कहो ना हमसे आज क्या इरादा है…!

जाओ-जाओ री सखियों ना सताओ मुझको
लाज आये री मुझे कुछ ना बताऊँ तुमको
पिया जी से किया इक वादा निभाना है
जाओ री सखियों, क्या कुछ और बताना है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मुझ को आज भी तुम्हारा इन्तज़ार है

मुझ को आज भी तुम्हारा इन्तज़ार है
वही तड़प है, दिल उतना ही बेक़रार है

तेरी हँसी और हया के लिए मेरी आँखों में
जानम आज तलक उतना ही प्यार है
वही तड़प है, दिल उतना ही बेक़रार है

तुमसे मिलके पतझड़ में बहार खिल जाती है
तुम बाँहों में हो तो मुझे क़रार है
मुझ को आज भी तुम्हारा इन्तज़ार है

नज़रों के वह सिलसिले ख़ामोशी की आड़ में
उनसे आज भी मुझ को इक़रार है
वही तड़प है, दिल उतना ही बेक़रार है

गुलाबी फूल फिर मुस्कुराने लगे शाख़ों में
इनमें रंग तेरा ही मेरे यार है
मुझ को आज भी तुम्हारा इन्तज़ार है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

हमने तुमको तुमसे चुराया

हमने तुमको तुमसे चुराया
दिल में अपने तुमको बसाया
तुम भी दीवाने हो गये हो
दूर जो ख़ुद से हो गये हो
आओ अपनी बाँहों में तुमको छुपा लें सनम
आओ अपनी बाँहों में तुमको छुपा लें सनम

क़रीब आ तेरा दिल धड़का दें
दिल में कोई शोला भड़का दें
तुमको दोनों बाँहों में भरकर
सनम प्यार करना सिखा दें

तुम यह दिल तो धड़का दो
हमको प्यार तो सिखा दो
पर वादा करके ओ जानम
हमको छोड़ न जाना तुम…

ज़रा करके तो देखो हमपे भरोसा
मैं नहीं कर सकता तुमसे धोखा
आओ अपनी बाँहों में तुमको छुपा लें सनम
आओ अपनी बाँहों में तुमको छुपा लें सनम

दिल की ख़ाहिश तेरी ज़ुल्फ़ों में
आज हम ख़ुद को उलझा दें
तेरे गले लगके मेरे सनम
आज तुमको अपना बना लें

ज़ुल्फ़ों में उलझ तो जाओगे
मुझको अपना तो बनाओगे
पर क्या हम मिल पायेंगे
प्यार को सच कर पायेंगे…

दिल से दिल जब मिल जाये
यह प्यार भी सच हो जाये
आओ अपनी बाँहों में तुमको छुपा लें सनम
आओ अपनी बाँहों में तुमको छुपा लें सनम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४