तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है

तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है
रह-रहकर रुक-रुककर बार-बार उठती है

हम बीमारि-ए-इश्क़ के मारे हुए हैं और
तेरी नज़र पैनी हो कर बार-बार उठती है

नाज़ो-नख़्वत1 के पैमाने किस तरह उठाऊँ
नज़र उठती है तो ज़िबह2 को यार उठती है

हम देखते हैं तेरे जानिब3 प्यार की नज़र से
तेरी नज़र, उफ़! मानिन्दे-कटार4 उठती है

ग़ैर से तुम को मोहब्बत हुई है बे-वजह
और फिर भी नज़र बाइसे-गुफ़्तार5 उठती है

हैं चमन में और भी नज़ारे ऐ ‘नज़र’ लेकिन
फिर क्यों तेरी नज़र सिम्ते-यार6 उठती है

शब्दार्थ:
1. नाज़ और नख़रे; 2. लड़ाई, क़त्ल; 3. ओर, तरफ़; 4. तलवार की तरह (आवाज़ करती हुई); 5. बात करने के लिए; 6. प्रेयसी की तरफ़


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं

तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं
तेरे हुस्न के पीछे पागल हूँ मैं
शैदाई दीवाना आवारा बादल हूँ मैं
तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं

तेरे ख़ाब पलकों में छिपाये फिरता हूँ
गिर न जायें आँसू बनके डरता हूँ
यह है इब्तदा-ए-सहर-ए-मोहब्बत
इन्तहाने-इम्तिहाँ के लिए मरता हूँ

ऊदी-ऊदी साँसों से सीने में जलन है
सूखा-सूखा मेरे दिल का गुलशन है
हैं दूर तक वदियों में पानी की तहें
फिर किसके लिए प्यासा मेरा मन है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

शाख़ों पर लौट आये मौसम कोंपलों के

शाख़ों पर लौट आये मौसम कोंपलों के
न क्यों फिर खिले, गुल दो दिलों के

यह उम्र जायेगी तेरे लिये ज़ाया
गर यह फ़ासले रहे यूँ ही मीलों के

तुम नहीं तो चाँदनी उदास रहती है
सब ताज़ा कँवल सूख गये झीलों के

ज़ब्रो-सब्र से क़ाबू आया है दिल
हर लम्हा बढ़ते हैं दौर मुश्किलों के

मैं लोगों की भीड़ में तन्हा रहता हूँ
मुझको रंग फ़ीके लगते हैं महफ़िलों के

सन्दली धूप की छुअन का यह जादू है
ख़ुशबू से भर गये जाम गुलों के

मैं यह सोच के जल जाता हूँ सनम
तुम्हें तीर चुभते होंगे मनचलों के

‘नज़र’ आज वाइज़ है बहुत ख़ामोश
क्या उसके पास हल नहीं मसलों के

ज़ाया: बेकार । कँवल: कमल के फूल । वाइज़: बुध्दिजीवी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला
मुझको हर गाम नीचा दिखाके क्या मिला
हर वक़्त इम्तिहान और बस इम्तिहान
मुझको राहे-ख़ुदा में और कुछ भी न मिला

ख़ाली सीने में दर्द ही ज़मीं दर्द ही आसमाँ
दूर तक राहों में दर्द के निशाँ बस निशाँ
बाहर आ गया जिगर फाड़ के क़तराए-लहू
ऐ ख़ुदा तूने दिया मुझको किस बात का सिला

हँसना मुझे रक़ीब का’ तीर-सा लगता है
रखे अगर वह बैर मुझसे रखता है
जाने उसकी आँखों में मैं खटकता हूँ कि नहीं
ऐ ख़ुदा हर बार मैं ही क्यों मूँग-सा दला

राहे-इश्क़ में मुझे पत्थर का दिल नहीं
ज़ीस्त यह गँवारा मुझे बिल्कुल नहीं
मैं ख़ुदा को किसका वास्ता देकर कहूँ कि बस!
ख़ुदा-ख़ुदा कहने से हासिल कुछ भी न मिला

अपने ज़ख़्मों पे ख़ुद आप मरहम रखूँ
यह दर्द अगर कहूँ तो आख़िर किससे कहूँ
बात-बात पे ख़ुद से बिगड़ना आदत बन गयी
दरबारे-ख़ुदा से मुझको कुछ भी न मिला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा

क्योंकर प्यार न आये नरगिसी आँखों पर
क्योंकर गुल न महकाये बहार शाखों पर

इस दीवाने को दीवानगी सिखायी किसने
दिल में उसके यह आग लगायी जिसने

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा

किस क़ातिल अदा से तुमने तीर चलाया है
अपनी नज़रों से मेरा जिस्म महकाया है

क्योंकर शोलों पर चलने का ग़म होगा
जब तुम जैसा साथ कोई हमदम होगा

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा

इश्क़ की मय आँखों से पिला दी है तुमने
और जन्नत की रहगुज़र पा ली है हमने

वाक़िफ़ नहीं तू मेरी मोहब्बत से जाने-जाँ
तेरे साथ जो न गुज़रा वो लम्हा’ लम्हा कहाँ

आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३