उसकी आँखें

मैंने कभी उससे बात नहीं की मगर क्यों उसकी आँखें मुझको पहचानती हैं?
क्या जानती हैं मेरे बारे में, क्या जानना चाहती हैं उसकी आँखें?
कभी आश्ना तो कभी अजनबी लगती हैं उसकी आँखें, मानूस आँखें!

उसकी आँखें पहचानती हैं मुझे, मगर कुछ कहती नहीं…
वो गुज़रती है जितनी बार सामने से –
एक बार तो मुड़ती हैं, उठके झुक जाती हैं, उसकी आँखें

उनकी कशिश कमसकम एक दफ़ा तो अपनी जानिब खींच ही लेती है
मेरी बेज़ुबाँ आँखें चाहकर भी उससे कह नहीं सकतीं कि…
उसकी आँखें कितनी ख़ूबसूरत हैं, उसकी आँखों की कोई तफ़सील नहीं…

(DB के नाम)
Penned on 31 Dec 2004

You are my first and last love

You are my first and last love
form the first encounter1
my heart is trying to shove2

You are my first and last love
I swear I swear I swear

Heart found a place to dwell
deep inside of your bosom
spring has reason to bloom
now, there no place to autumn

You are my first and last love….

You smile so pretty so beautiful
that’s why, I liked you in a while
felt a goddess come to be mine
to bask me with her gorgeous smile

You are my first and last love…

You stole my heart my pain
that I have to say is everything
everything is love only love
your face to me is soothing

You are my first and last love….

1. meeting by chance, 2. forcing


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

You’re an angel

You’re an angel
Come to earth
Only for me
Most beautiful
In whole world
As one should be

You are my dream
That I wanted
In my life
I never found
Someone like you
You’re my type

Don’t take me wrong
If I got hurt you
Don’t be angry

You are an angel
Come to earth
Only for me
Most beautiful
In whole world
As one should be

Through my eyes
You look gorgeous
You look best
You are the one
Compare to whom
Beauty is dust

I was all alone
You turned me on
Thanking you gladly

You’re an angel
Come to earth
Only for me
Most beautiful
In whole world
As one should be


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

मेरी मोहब्बत को समझते हो तुम ग़लत

मेरी मोहब्बत को समझते हो तुम ग़लत, ग़लत नहीं है
तुमको चाहा है मैंने अगर इसमें कुछ ग़लत नहीं है

दिखा दो तुम कोई अपना-सा इस ज़माने में मुझको
मैं अगर फिर चाह लूँ उसको इसमें कुछ ग़लत नहीं है

आँखों को मेरी सुकून आया है तेरी हसीन सूरत देखकर
किसी चेहरे से सुकूनो-सबात पाना कुछ ग़लत नहीं है

मैं ने अगर देखा है तेरी आँखों में तो तूने भी देखा है
मोहब्बत की नज़र से किसी को देखना कुछ ग़लत नहीं है

डरते हो क्या तुम अपने-आप से या फिर जानकर किया सब
पहले प्यार में दिल का उलझ जाना कुछ ग़लत नहीं है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

मैं हूँ हस्ति-ए-नाचीज़

मैं हूँ हस्ति-ए-नाचीज़’ मुझसे किसी को चाह नहीं
मैं हूँ शिगाफ़े-शीशा’ मुझसे किसी को राह नहीं

मैं आया हूँ जाने किसलिए इस हसीन दुनिया में
किसी की आँखों में मेरे लिए प्यार की निगाह नहीं

मैं हूँ अपने दर्दो-आहो-फ़ुगाँ की आप सदा
शायद इस गुमनाम रात की कोई सुबह नहीं

कोई क्या जाने तन्हाई के साग़र’ हमसे पूछो
कि अब मेरे इस दिल में और ख़ाली जगह नहीं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४