I am a destroyer

I am a destroyer
destroying myself so selfishly
There is a monster and a devil
waking in nights, inside of me

Lights lighten the days
with love and beauty
But darkness chases me
in shift of nights, so panicky

I am a destroyer
destroying myself so selfishly

My heart is in my hands
but truth never fades
I’m sinking into a mud
when I onto the bed

A sword’s bruising my heart
I’m running to be apart

I am a destroyer
destroying myself so selfishly
There is a monster and a devil
waking in nights, inside of me

I’m in search of a goddess
who saves all my goodness
My world keeps drowning
and I’m destroying…

There is no birth of stars
my destiny looking afar

I am a destroyer
destroying myself so selfishly
There is a monster and a devil
waking in nights, inside of me


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2003

मतलब से ही जनम लेता है कोई रिश्ता

मतलब से ही जनम लेता है कोई रिश्ता
मतलब से ही मिट जाता है वह रिश्ता

तख़लीक़ के इस भँवर में तकलीफ़ है बहुत
सँभलकर बुन जब भी बुन नया रिश्ता


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

ॐ शक्ति है

ॐ शक्ति है ॐ ही ईश्वर प्रतीक है
ॐ नश्वर है ॐ ही सर्वत्र एक है
ॐ भक्ति है ॐ ही शान्ति मंत्र है
ॐ जगत है ॐ ही जीवन तंत्र है

ॐ में तुम हो ॐ हर कण तुम में
ॐ मृदा धातु जल वायु गगन में

ॐ सत्य है ॐ ही चिंतन मनन है
ॐ आत्मा है ॐ ही प्रभु शरण है
ॐ विष्णु है ॐ ही त्रिकाल महादेव है
ॐ दृष्टि है ॐ ही सुर और रव है

ॐ विद्यमान है प्राण है हर जीव में
ॐ ही सजीव में ॐ ही निर्जीव में

ॐ संगीत है ॐ ही श्रेष्ठ मित्र है
ॐ असत्य पर विजय का शस्त्र है
ॐ ब्रह्माण्ड है ॐ उत्पत्ति सूत्र है
ॐ मोक्ष है ॐ ही मुक्ति स्रोत है

ॐ चहुँ ओर ज्ञान का प्रकाश है
ॐ कष्टकाल अंधकार का विनाश है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

जिसके लम्स ने तख़लीक़ किया

लोग कहते हैं इश्क़ ने किया है मुझको गुमराह
दुनिया में आया हूँ जिसके लिए करे मुझको ज़िबह

जिसके लम्स ने तख़लीक़ किया तेरे ‘विनय’ को
किसने बनायी उसकी निगाहों में शिकनो-गिरह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४

तख़लीक़ हुआ है [ver. 2.0]

मेरे ही हाथों में टूटा है दम मेरा
तेरे ही स्पर्श से तख़लीक़ हुआ है
यह ‘विनय’…

नया जन्म हुआ है तो
नये अहसास भी होंगे
अभी-अभी मेरी मुट्ठी में
जन्मी है यह क़िस्मत

खुलेगी जो कई और कई
जीतों के जश्न भी होंगे
जिससे मेरी हर सोच जुड़ी है
सिर्फ़ एक तुम हो!

मेरी इब्तिदा मेरे ये जश्न
सब तुम्हीं से तो हैं…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२