यह सोज़गाह है कि मेरा दिल है

यह सोज़गाह1 है कि मेरा दिल है
मुझको जलाने वाला मेरा क़ातिल है

जिसे देखकर उसे रश्क़2 आता है
वह कोई और नहीं माहे-क़ामिल3 है

जिसने मुझको कहा सबसे अच्छा
वह कोई पारसा4 है या बातिल5 है?

तुम जाने किस बात पर रूठे मुझसे
लहू में ग़म हर क़तरा शामिल है

मेरा यह दिल आ गया तुम पर
तू मेरी पुरनम6 आँखों का हासिल है

मुझसे रूठकर दुनिया बसा ली
मेरा यार मुझसे ज़ियादा क़ाबिल है

वह उसके लिए मेरा मुक़ाबिल7 था
आज वह ख़ुद उसका मुक़ाबिल है

वह ग़ज़ल में अस्लूब8 ढूँढ़ता है
‘नज़र’ वाइज़9 भी कितना जाहिल10 है

शब्दार्थ:
1. दिल की जलन का स्थान 2. ईर्ष्या 3.पूरणमासी का चाँद 4. महात्मा 5. झूठा, जिसकी बात की कोई मान्यता न हो 6. गीली, भीगी 7. शत्रु 8. नियम, शैली 9. बुद्धिजीवी 10. अनपढ़ की तरह बर्ताब करने वाला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

I’m deserted with dreams

I’m deserted with dreams to feel the thirst
And trying to find all your best

I did each n’ every time what you wanted
But baby you were blind to count it

You did all the things well, except one
You couldn’t understand my comprehension

I love you truly more than my life
In this world you’re the one of my type

Here is my longing baby, where are you?
Everyday I’m crying blood to get you

Some uncertain things are to be happen
Baby, If we’re going set ourselves frozen

Please please don’t go away don’t be apart
You are from where myself gets start

I want you to get on to happiness
Without you here I am left breathless

frozen: unfriendly


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

काश यह सन्दली शाम महक जाती

काश यह सन्दली शाम महक जाती
सबा* तेरी ख़ुशबू वाले ख़त लाती

तुझसे इक़रार का बहाना जो मिलता
मेरी क़िस्मत शायद सँवर जाती

दीप आरज़ू का जलता है मेरे लहू से
काश तू इश्क़ बनके मुझे बुलाती

दूरियाँ दिल का ज़ख़्म बनने लगीं हैं
होता यह नज़दीकियों में बदल जाती

सबा: ताज़ा हवा, breeze


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

जब ख़ुद को ख़ुद से तन्हा पाता हूँ

जब ख़ुद को ख़ुद से तन्हा पाता हूँ
मैं बस तेरे क़रीब चला आता हूँ

क्यों न कहा तुमसे कभी हाले-दिल
क्यों आज रोता हूँ पछताता हूँ

बरसों से पड़ी हैं विरह में सूखी-सूखी
मैं क्यों आज आँखों को भिगाता हूँ

जब मेरे दर्दों को कोई नहीं सुनता
मैं दर्दों को जलाता हूँ बुझाता हूँ

तुम गये आँखों से रोशनी गयी
बुझी आँखें तेरे ख़ाबों से जलाता हूँ

बहुत दिन हुए चाँद की बात न की
सुबह-शाम तेरे साथ बिताता हूँ

मेरे चमन को बहार ने रुख़ न किया
मैं पतझड़ ओढ़ता हूँ बिछाता हूँ

ऐ ‘नज़र’ तुझे क्या हुआ? क्यों चुप है?
लहू से तर दामन मैं रोज़ सुखाता हूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

भीगी चाँदनी रातों में

भीगी चाँदनी रातों में
दिल से तेरी बातों में
ऐसा लग रहा है
तू मेरी बन गयी है
मैं तेरा बन गया हूँ

ख़ाब बुनती हैं आँखें
फूलों से लदी हैं शाख़ें
ऐसा लग रहा है
तू ख़ुशबू बन गयी है
मैं गुल बन गया हूँ

हल्की-हल्की आँच है
मेरी नब्ज़ में काँच है
ऐसा लग रहा है
तू लहू बन गयी है
मैं जिस्म बन गया हूँ

तारे, चिंगारियाँ हैं
चाँदनी, उजली बर्फ़ है
ऐसा लग रहा है
तू लौ बन गयी है
मैं दीप बन गया हूँ

लफ़्ज़ मीठे-मीठे हैं
ग़म फीके-फीके हैं
ऐसा लग रहा है
तू मिसरी बन गयी है
मैं ज़बाँ बन गया हूँ

दिल ग़मख़्वार है
मौसम ख़ुशगँवार है
ऐसा लग रहा है
तू दिल बन गयी है
मैं जाँ बन गया हूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३