What I am what I wanna be

What I am what I wanna be
Shame shame a big shame on me
What I am what I wanna be

There’s no light there’s no glee
What I am what I wanna be
Shame shame a big shame on me

Losers turn as the winners
I am last in all the beginners
How can now I be sorry?

What I am what I wanna be
A big shame on me

I’m being chained in my laziness
N’ falling down with craziness
Why I ‘m not so worry

What I am what I wanna be
A big shame on me

How can I rectify myself
May be there’s no hope for help
I wanna leave it all and fly

What I am what I wanna be
There’s no light there’s no glee
What I am what I wanna be


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

शाम यह प्यासी रहती है पल-पल

शाम यह प्यासी रहती है पल-पल
भीनी-भीनी उदासी रहती है पल-पल

न हँसती है. न रोती है. यह शाम कैसी है?
तेरी यादों में डूबी रहती है पल-पल

रंग सारे सिमटने लगे हैं लकीरों में
शाम बेरंग फ़ीकी रहती है पल-पल

ख़ामोश है क्यों, वह उदास है क्या?
शाम आँखों में भीगी रहती है पल-पल

चाँद की ख़ुशियाँ शाम के दर्द मत पूछो
टूटी-बिखरी हुई रहती है पल-पल

मैं यानि ‘नज़र’ ही जाने सबब जीने का
मौत तो आती-जाती रहती है पल-पल


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह जिस्म नहीं है

यह जिस्म नहीं है, काँच के टुकड़े हैं
ज़मीने-वक़्त पर दूर तक बिखरे हैं
इन्हें मत छूना हाथों में चुभ जायेंगे
ये वो दिये हैं, लम्हों में बुझ जायेंगे…

My hopes are broken
My soul is bruised
but you’re loving me, why?

कब तक दीवार बनाते रहोगी तुम
दिलो-दुनिया के बीच, कुछ बोलो तो
कशमकश कोई
तुझे मुझसे न होगी
यह निहाँ राज़ तुम, मुझपे खोलो तो

My hopes are broken
My soul is bruised
but you’re loving me, why?

नहीं समझते हो अगर मेरी बात तो
आओ तुम मुझको बाँहों में थाम लो
मेरे ख़ुदा बन जाओ तुम मेरे लिए
अपने लबों से एक बार मेरा नाम
लो


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

जो दिल से जाता नहीं है

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

साँसों की सरगम बस तुम ही तुम
लफ़्ज़ों में जब हम बस तुम ही तुम

कहना कितना मुश्किल था
यह समझा न सके
अपने दिल की बात हम
तुम्हें बता न सके

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

प्यार क्या है सनम हमें कब पता था
हमें जब तुम मिले तब पता चला था

अकेले रहना मुमकिन नहीं
यह कह न सके
अपने दिल के जज़्बात हम
तुम्हें जता न सके

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

अब तो ऐसा लगता है मुझको
जैसे फूलों में ख़ुशबू नहीं है
तुम जो नहीं यहाँ पर सनम
जैसे यहाँ पर कुछ भी नहीं है

बेचैन करती हैं यादें दिन-रात
बुझती नहीं हैं साँसें
हर लम्हा सोचता हूँ क्या मैं
करूँ तो क्या करूँ

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है

कुछ और अब बाक़ी नहीं
बस मैं हूँ मेरा ख़ाब है
ख़ामोश रहती हैं यह रातें
बस मैं हूँ मेरा साथ है

ज़िन्दगी मेरी तुम बदलकर चले गये
तन्हा कर गये हमें तन्हा कर गये

जो दिल से जाता नहीं है
तू वह गीत है
जो दिल में आकर बसा था
तू वह मीत है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

Truth is bitter

You always compared and found me better
Like all other, this truth is bitter
I know you are envious to me
and wanna devour me like the monster

I am careful and making my own way
There is happiness and peace
I have brim my courage to win
Now you’ll again see me as a getter

You always compared and found me better
Like all other, this truth is bitter

Feeling that comes from inside
is different as darkness from light
Mistakes you made are countless
But you always named me a witter

I know you are envious to me
and wanna devour me like the monster

Friendship is a rainbow between two hearts
But you didn’t understand what I expected
I was broken hearted and expelled
But it’s all, for you, doesn’t matter

You always compared and found me better
Like all other, this truth is bitter


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2006