Still faces

Still faces
Some unforgettable traces
Make your mind
Go back to you
See, what…
You had tried to find
Sound nights
Hard dreams
Feeling dry winds

Still faces
Emotionless
No meaning in eyes
Wherefore, they dry
Still faces
Expressionless
Stupid things in eyes
Wherefore, they cry

Past had a long past
Drive your life
Faster than fast
Try to get
What you had to loose
Because
There’s no more heart to bruise

Kick your drugs
And fit your arms with her
To live a long life
There’s no more need to add cipher

Still face
Some unforgettable traces
Make your mind
Emotionless, expressionless


Words: Vinay Prajapati
Penned: 2002

कितने ही ज़ख़्म चाक हुए तेरे जाने के बाद

कितने ही ज़ख़्म चाक हुए तेरे जाने के बाद
हुए तेरी हसरत में मुए तेरे जाने के बाद

सोहबत किसी दोस्त की रास न आयी हमें
अजनबी से दोस्तों में रहे तेरे जाने के बाद

जब भी पहलू में किसी के यार को देखा हमने
ख़ाहिश तेरी करते रहे तेरे जाने के बाद

दिल का हर टुकड़ा हर एक साँस पे रोता है
हम उसके आँसू पोंछा किये  तेरे जाने के बाद

तुम मिल जाओ अगर ज़ीस्त मिल जाये हमें
जिस्म अपना बचाते रहे तेरे जाने के बाद

उज्र हमको नहीं था तुमसे बात करने को
फिर भी नज़्म लिखते रहे तेरे जाने के बाद

तुमसे जो मरासिम है हमारा वो इश्क़ ही है
हम जी से इसे निभाते रहे तेरे जाने के बाद

फ़िराक़ ने साँसों में इक गाँठ लगा दी है सनम
जतन ढेर छुटाने को किये तेरे जाने के बाद

दर्द और तन्हाई के निश्तर चुभते हैं
हम मान्निद दीवाने हुए तेरे जाने के बाद

तमाशा गरचे अपनी मौत का किसने देखा है
नज़’अ में साँस भरते रहे तेरे जाने के बाद


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
वह जो है माहे-कामिल है वही

मुझको तो इख़लास है उसी से
ख़ुदा मुझसे संगदिल ही सही

अजनबी है जी मेरा मुझसे ही
वह दर्द से ग़ाफ़िल ही सही

चश्मे-तर से न बुझी आतिश
यह दाग़े-तहे-दिल ही सही

मरहम न करो घाव पर मेरे
चाहत मेरी नाक़ाबिल ही सही

अंजाम की परवाह है किसको
सीने में शीशाए-दिल ही सही

उफ़ तक न की जाये तेरे ग़म में
नालए-सोज़े-दिल है यही

बोले है तेरा इश्क़ सर चढ़के
ख़ुद में मुकम्मिल है यही

चाँदनी रिदा है रोशनाई आज
शाम को सुबह के साहिल ही सही

अफ़सोस किस बात का नज़र
तमाम उम्र का हासिल है यही


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मक़सद है मेरे पास क्या जीने को

मक़सद है मेरे पास क्या जीने को
कहाँ से लाऊँ तुम-सा बहाना जीने को

साँस चलती है ज़ख़्म करते हुए
कौन कब तक करेगा दवा जीने को

तस्वीरे-सुखन आँखों में अयाँ है
सुखनवर को देते हो दुआ जीने को

रखे हैं सभी दाग़ जो तुमने दिये
अब जलता है वह दिया जीने को

नरमी बरतो ज़रा दिल से ‘नज़र’
कर न बैठे वह कोई ख़ता जीने को


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

ख़ाली सीने में कुछ धुँआ-धुँआ-सा है

ख़ाली सीने में कुछ धुँआ-धुँआ-सा है
जिस सिम्त देखता हूँ दिल बदगुमाँ-सा है

दर्द को दर्द हो ऐसा होता नहीं
इसीलिए ख़ातिर में यह नौ-जवाँ-सा है

ख़ुदा ही मेहर से मैं रहा सदियों के फ़ासले पे
आज भी वह ना-मेहरबाँ-सा है

ढूँढ़ता हूँ मैं ख़ुद को उस गली में
जिसमें मुझे ज़िन्दगी होने का नुमाया-सा है

रोशनी में भिगो दिया शबे-महफ़िल को जिसने
तेरी रंगत का शुआ-सा है

एहसासात दफ़्न हैं किसी कब्र में
दर्द दिल का आज कुछ बे-ज़ुबाँ-सा है

खींच लिया जिगर को दाँतों से लब तक
आज महफ़िल में यह कमनुमा-सा है

तेरी दीद से बादशाहत मिली थी मुझे
ज़ख़्म कहता है तेरा साया हुमा-सा है

बदनसीबी गर्दिशे-अय्याम है बस
वक़्त यह एक इम्तिहाँ-सा है

तमाशा बहुत हुआ तेरे जाने के बाद
जो कुछ भी हुआ ज़ख़्मे-निहाँ-सा है

शज़र बेसमर हैं नकहते-गुल भी नहीं
मौसम यह ज़र्द ख़िज़ाँ-सा है

ज़ीस्त नवाज़ी गयी सो जी रहे हैं
मगर जीना मुश्किल मरना आसाँ-सा है

मैं गर तेरा तस्व्वुर करूँ
बूँद-बूँद शबनम का गिरना भी गिरियाँ-सा है

तुम नहीं गुज़रते इस राह से
मेरी गली का हर पत्थर रेगिस्ताँ-सा है

वह उजाले जिनसे चौंक गयीं थीं मेरी आँखें
मंज़र वह भी कहकशाँ-सा है

ना पूछ कब से तेरे दीवानों में शामिल हूँ
हाल मेरा भी कुछ-कुछ बियाबाँ-सा है

नीली शाल में लिपटी देखा था तुझे
तब से जाना कि चाँद किसी माहलक़ा-सा है

तुम आये घर मेरे आस्ताने तक
कि अब का’बा ही मेरे सँगे-आस्ताँ-सा है

इश्क़ में हमसा न पायेगा कोई
न होना मेरा उनकी बज़्म में हरमाँ-सा है

हम वस्ल की तमन्ना में मुए जाते हैं
ज़ुज तेरे सभी से वस्ल हिज्राँ-सा है

शगून तेरे देखने भर से होता था
आज इन आँखों में हर क़तरा टूटा-टूटा-सा है

बेज़ार है चमन तितली ज़र कैसे पिये
अब कि मौसम भी कुछ बेईमाँ-सा है

ज़हर हमको दिया दवा बता के ख़ुदा ने
ज़ीस्त जो बख़्शी यह भी सौदा-सा है

‘नज़र’ बातें हैं बहुत उसके इश्क़ो-ग़म में
जिसका दिल पर निशाँ-सा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३