उदास शाम है और आँखों में नमी है

उदास शाम है और आँखों में नमी है
मैं बहुत तन्हा हूँ तेरी कमी है

आँखें हैं आँसुओं का एक समन्दर
दिमाग़ में यादों की बर्फ़ जमी है

बह रहा है वक़्त बहुत तेज़
ख़ाली सीने में इक साँस थमी है

क्या जला है शबभर ख़्यालों में
शायद मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

मुक़र जाता है ख़ुदा अपनी बात से
क्या वह भी कोई आदमी है?

मेरे प्यार को गर न मिलें तेरी बाँहें
तो मौत ही मुझको लाज़मी है

जो देखकर मुस्कुराते हैं मुझको
उनके मन में गहमागहमी है

सर्द बहुत बढ़ गयी है दिल में
ऊदी-ऊदी धूप बहुत सहमी है

क्या बुझाता रहा हूँ आज सारा दिन
क्यों दर्द की छुअन रेशमी है

किसी चोट से मेरा दिल टूटा नहीं
तेरी यादों से हुआ ज़ख़्मी है

मैंने उफ़क़ में ढूढ़े हैं तेरे रंग
शफ़क़ आज कुछ शबनमी है

सूखे हुए कुछ फूल पड़े हैं ज़मीं पर
फूलो-शाख़ का रब्त मौसमी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

अपनी क़िस्मत पे नाज़ करते

अपनी क़िस्मत पे नाज़ करते, ग़ुरूर होता
जो कभी तेरे लबों से हमारा मज़कूर होता

अगरचे हमने छुपाया राज़े-दिल तुम से
डर था तेरी निगाह में यह ना क़ुसूर होता

तुमसे कुछ न कहा इसमें ख़ता हमारी थी
बताता दर्दे-हिज्र जो ना मजबूर होता

क़िस्सा-ए-इश्क़ मुख़्तसर था बहुत
इक और मोड़ होता तो ज़रा मशहूर होता

तुमने मुझे देखकर जाने क्या सोचा होगा
काश मैं शक्ल से ख़ूबसूरत थोड़ा और होता

क्या हम ना पाते अपनी मोहब्बत को
गर हमें अपनी वक़ालत का शऊर होता

हम-तुम मिल ही जाते सनम इक रोज़
जो इश्क़ में आशिक़ों का मिलना दस्तूर होता

हैं आलम में वही रंग नये-पुराने, यादों के
तुम भी होते परेशाँ तो मज़ा ज़रूर होता

तड़प-तड़प के मैंने यह ग़ज़ल लिखी है
काश मेरी क़िस्मत में वह जमाले-हूर होता

पल-पल बिगड़ रहा है हाल तेरे बीमार का
ऐ ‘नज़र’ काश कि आज को वह न दूर होता


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००