I am a destroyer

I am a destroyer
destroying myself so selfishly
There is a monster and a devil
waking in nights, inside of me

Lights lighten the days
with love and beauty
But darkness chases me
in shift of nights, so panicky

I am a destroyer
destroying myself so selfishly

My heart is in my hands
but truth never fades
I’m sinking into a mud
when I onto the bed

A sword’s bruising my heart
I’m running to be apart

I am a destroyer
destroying myself so selfishly
There is a monster and a devil
waking in nights, inside of me

I’m in search of a goddess
who saves all my goodness
My world keeps drowning
and I’m destroying…

There is no birth of stars
my destiny looking afar

I am a destroyer
destroying myself so selfishly
There is a monster and a devil
waking in nights, inside of me


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2003

बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म

बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म साँस के एक ही धागे में
टुकड़े-टुकड़े बिखरी हुई ज़िन्दगी बहुत नज़दीक़ लगी है

तुम नहीं मेरे साथ तो ज़िन्दगी एक अंधेरी ख़ला है!

बारहा: Several times


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ

मैं क्यों आज तक उसकी ख़ाहिश करता हूँ
जो मुझको भीड़ में अकेला छोड़कर गया है
सुबह आज भी उसको आइनों में जोड़ता हूँ
जो मेरे दिल को खिलौने-सा तोड़कर गया है…

बे-तस्कीनियाँ उजले चेहरों से बढ़ती हैं
हर पल मुझको अक्स की तरह पढ़ती हैं
अंधेरी रात है मैं छत पर तन्हा बैठा हूँ
एक-एक पल दोपहर-सा गुज़र रहा है…

कोई उठाये मुझको या फिर बैठा रहने दे
ख़ाबों के जंगल जलाये ना, धुँआ उड़ाये ना
ख़ाहिशों का अम्बार है, दिल ज़ार-ज़ार है
आँखों की नदिया सुखाये ना, चाँद जलाये ना

अजीब धुनकी में है दिल और कुछ नहीं है
दर्द का ग़ुबार है दिल और कुछ नहीं है
मुस्कुराहट जब खिली गुलाबी लबों पर
एक हसीन ख़ाब सारी रात जागता रहा है…

एक नयी परवाज़ दिखायी दी है आसमाँ में
कुछ नये अन्दाज़ भी हैं उसकी ज़बाँ में
बाँट नहीं सकता किसी से लम्हों के टुकड़े
ख़ुदाया मेरा कोई नहीं इतने बड़े जहाँ में


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

ज़िन्दगी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं तुम तक आ गया

ज़िन्दगी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं तुम तक आ गया
सरे-राह मैं अपनी मंज़िल पा गया
चराग़ों का नूर हो, चश्मे-बद्दूर हो
तुम्हें देखकर दिल अँधेरों से दूर आ गया

ख़ुशियों के दीप जल उठे, ग़म सारे बुझ गये
पतझड़ उतरा, गुल शाख़-शाख़ खिल गये
इक-इक धड़कन में नाम तुम्हारा है
तुम्हारी मोहब्बत का जादू मुझपे छा गया

ख़ुशबू-ख़ुशबू मैंने तुमको पाया सनम
मोहब्बत में तेरी ख़ुद को मिटाया सनम
तेरी पहली नज़र से क़त्ल हुआ था मैं
लहू के हर क़तरे में तेरा प्यार समा गया

राज़ दिल के सभी आँखों से बयाँ कर दो
राहे-मुहब्बत मेरी तुम आसाँ कर दो
नहीं कोई अरमाँ तेरी चाहत के सिवा
बस तेरा ही चेहरा दिलो-दिमाग़ पे छा गया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

दिल तोड़ना at first sight

दिल तोड़ना at first sight
झूठा गुस्सा उस पर झूठी fight
लड़की है दीवानी लड़का दीवाना
अपनी दोनों की जमेगी, right!

तुमको रोज़-रोज़ करता हूँ miss
please करने दो न एक kiss
तुमको बनाऊँगा अपनी जान
चाहोगी लाऊँगा तुम्हारे लिए चाँद

ऐसी अदा ऐसा नशा जो देखा
तुझे देखते ही प्यार हो गया
आँखें बंद करके लेट भी गया
पर नींद न आयी सारी-सारी night

लड़की है दीवानी लड़का दीवाना
अपनी दोनों की जमेगी, right!
दिल तोड़ना at first sight
झूठा गुस्सा उस पर झूठी fight

मेरे love का angle ज़रा टेढ़ा है
इन रास्तों पर रोड़ा ही रोड़ा है
पर मेरी बात न माना मेरा दिल
ढूँढ़ता रहा एक नयी मुश्किल

मैंने कितना अपनी बात समझायी
जो बीती वह कहानी दोहरायी
पीछे-पीछे दौड़ता रहा मुझको खींचता रहा
दिखाता रहा अंधेरे में light

लड़की है दीवानी लड़का दीवाना
अपनी दोनों की जमेगी, right!
दिल तोड़ना at first sight
झूठा गुस्सा उस पर झूठी fight


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २६ मई २००३