दर्द को दर्द का मरहम दे दे

दर्द को दर्द का मरहम दे दे
ऐ मौत न आने की क़सम दे दे

लगन यार की मन से जाये ना
दिल की तड़प काम आये ना
नहीं आता तो आने का वहम दे दे

मैं बिखर गया तेरे जाने के बाद
जाना प्यार तुझे खोने के बाद
मिलने का कोई वादा सनम दे दे

ऐ मौत न आने की क़सम दे दे…

मसला मुझे विरह की रातों ने
तोड़ा-जोड़ा मुझे बीती बातों ने
मेरी रूह को चैन हमदम दे दे

यह ख़ुमार अब आठों पहर है
ज़िन्दगी जैसे कोई ज़हर है
मुझको वही ख़ुशी का मौसम दे दे

ऐ मौत न आने की क़सम दे दे…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

दीप जलाओ रात को पूनम कर दो

दीप जलाओ रात को पूनम कर दो
मेहबूब की यादों से आँखें नम कर दो

तमन्ना को हसरते-विसाल है
ज़हर दे दो मुझे यह करम कर दो

शाम की ख़ाक गिरने लगी है आसमाँ से
मेरे ख़ातिर में सहरे-ग़म कर दो

बर्फ़ की गरमी से आजिज़ आ चुका मैं
बे-तस्कीनियों की धूप गरम कर दो

चाँद के छुपने का बाइस मैं कैसे कहूँ
‘वफ़ा’ आज बरसात का मौसम कर दो


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

बारिश जैसी हो तुम

खिली हुई शाम की बिखरी हुई धूप में
बारिश जैसी हो तुम
ये लाल फूल खिले हुए हैं
तुम्हारी यादों की तरह
ये भीगे हुए पत्तों पर हवा की सरसराहट-से हैं
बहते हुए तुम्हारे ख़्याल…

तन्हा शाम ऐसे खु़शनुमा मौसम में
तुमसे दूर मेरे साथ और भी ग़मगीन
और ज़्यादा नागँवार हो गयी है
कहाँ हो तुम?
तुम्हारे एहसास, तुम्हारी याद, तुम्हारे ख़्याल
सब मुझे तन्हाई की सूली पर चढ़ा रहे हैं…

अब तो आ जाओ
या अपने पास बुला लो मुझे
मेरे महबूब मेरे मसीहा
बादे-खु़दा सब तेरा है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४