बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा मोर मुकुट वाला
बजाये बाँसुरी श्रीकृष्ण हमारा
नाचूँ मगन नाचे वृंदावन सारा
राधा प्रेमी मीरा भी गोपाला
गोपियाँ पुजारन तेरी गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा कमल नयन वाला
कजरारी आँखें मधु का प्याला
इनसे कैसा जादू छलका डाला
सलोना रूप बरखा के घन-सा
और दमकत मुख चंद्रमा-सा

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा श्यामल तन वाला
गले में पड़ी प्रेम सुमन माला
प्रकृति का कण-कण मोह डाला
वह महंत सुन्दर हृदय वाला
छलका रहा करुणा का प्याला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

एक मुलाक़ात की इल्तजा है

एक मुलाक़ात की इल्तजा है
उससे दुआ है
वह क्यों नहीं मिलता मुझसे
उसे क्या शुबा है
मुझ मुरीद को न क़रार है
यह क्या धुँआ है
साँस बदन से जुदा-जुदा है
मुझे क्या हुआ है
मैं जिसके लिए मरना चाहता हूँ
वो मेरा खु़दा है
सनम मेरा गुले-सुम्बुल है
वो दिलरुबा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५