उदास शाम है और आँखों में नमी है

उदास शाम है और आँखों में नमी है
मैं बहुत तन्हा हूँ तेरी कमी है

आँखें हैं आँसुओं का एक समन्दर
दिमाग़ में यादों की बर्फ़ जमी है

बह रहा है वक़्त बहुत तेज़
ख़ाली सीने में इक साँस थमी है

क्या जला है शबभर ख़्यालों में
शायद मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

मुक़र जाता है ख़ुदा अपनी बात से
क्या वह भी कोई आदमी है?

मेरे प्यार को गर न मिलें तेरी बाँहें
तो मौत ही मुझको लाज़मी है

जो देखकर मुस्कुराते हैं मुझको
उनके मन में गहमागहमी है

सर्द बहुत बढ़ गयी है दिल में
ऊदी-ऊदी धूप बहुत सहमी है

क्या बुझाता रहा हूँ आज सारा दिन
क्यों दर्द की छुअन रेशमी है

किसी चोट से मेरा दिल टूटा नहीं
तेरी यादों से हुआ ज़ख़्मी है

मैंने उफ़क़ में ढूढ़े हैं तेरे रंग
शफ़क़ आज कुछ शबनमी है

सूखे हुए कुछ फूल पड़े हैं ज़मीं पर
फूलो-शाख़ का रब्त मौसमी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली
मैंने अपना बदन सेंका,
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली
मैंने तस्वीरे-आज फेंका…

मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं

रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़

लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

खिली-खिली महकी बहारें हैं

खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहते शिकारें हैं
ठण्डी-ठण्डी सौंधी हवाएँ हैं
गीले पत्तों को खनकाएँ हैं

जाने कैसी तलब जागी है
जाने किसका इन्तिज़ार है
बेज़ार-सा यह दिल मेरा
किसके लिए गुलज़ार है

आज ऐसा क्यों लग रहा है
नये-नये सब नज़ारें हैं
खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहते शिकारें हैं

शबनमी रातों का यह चाँद
और उजली-उजली चाँदनी
आइनाए-दिल में कौन यार है
इश्क़ जिससे वजहसार है

बंजर ज़मीने-दिल से आज
उलझे हुए मखमली धारे हैं
खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहते शिकारें हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

शबनमी सर्द रात है और ख़याल तेरा

शबनमी सर्द रात है और ख़्याल तेरा
चाँद तन्हा मैं तन्हा और ख़्याल तेरा

सबसे छुपाया पर छुपा न राज़े-मोहब्बत
छेड़छाड़ दोस्तों की और ख़्याल तेरा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

शबनम यूँ सुलगी रात सोते पत्तों पर

शबनम यूँ सुलगी रात सोते पत्तों पर
जैसे वह मुझको मिले और मिले भी ना

चाँद खिड़की पर बैठकर मुझे देखता है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३