नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
मुझको मोहब्बत है’ तुम से ही

नाज़ है तुम्हें’ थोड़ा ग़ुरूर मुझे
मैंने दिल लगाया है’ तुम से ही

आज न पिघला तो कल पिघलेगा
यह बात हम सुनेंगे’ तुम से ही

आज दूरियाँ हैं तेरे-मेरे बीच
ज़रूर कल मिलेंगे’ तुम से ही


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

शाख़ों पर लौट आये मौसम कोंपलों के

शाख़ों पर लौट आये मौसम कोंपलों के
न क्यों फिर खिले, गुल दो दिलों के

यह उम्र जायेगी तेरे लिये ज़ाया
गर यह फ़ासले रहे यूँ ही मीलों के

तुम नहीं तो चाँदनी उदास रहती है
सब ताज़ा कँवल सूख गये झीलों के

ज़ब्रो-सब्र से क़ाबू आया है दिल
हर लम्हा बढ़ते हैं दौर मुश्किलों के

मैं लोगों की भीड़ में तन्हा रहता हूँ
मुझको रंग फ़ीके लगते हैं महफ़िलों के

सन्दली धूप की छुअन का यह जादू है
ख़ुशबू से भर गये जाम गुलों के

मैं यह सोच के जल जाता हूँ सनम
तुम्हें तीर चुभते होंगे मनचलों के

‘नज़र’ आज वाइज़ है बहुत ख़ामोश
क्या उसके पास हल नहीं मसलों के

ज़ाया: बेकार । कँवल: कमल के फूल । वाइज़: बुध्दिजीवी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

कहीं भी पूरा नहीं था,
मेरे जिस्म पे इश्क़ का चीरा नहीं था
ख़ाली-ख़ाली था सूना-सूना था
दिल मेरा, यह दिल मेरा…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

क़तरा-क़तरा हर एक क़तरा
ज़हन से कोई न उतरा,
मीठे-मीठे ज़हर के प्याले
मैं भी एक उम्र से गुज़रा…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

मैंने पहल नहीं की थी
मैं इस सब से परहेज़ रखता हूँ
कितने मीठे होते हैं अय्यार
मैं यह कब चखता हूँ…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

ऐसे अर्श पे कब था डेरा
उगता है जहाँ, चटखा सवेरा
तकलीफ़ तख़लीक़ होती रही
दिल में नहीं होता बसेरा…

आइने-आइने ख़ुद को ढूँढ़ा
उनमें उतर के ख़ुद को ढूँढ़ा

अय्यार= चालाक, clever; अर्श= आसमाँ, sky; तख़लीक़= उद्भव, creation


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

तुम मेरे हो

तुम मेरे हो, मेरे ही मेरे हो
कितनी हों दूरियाँ, कितने हों फ़ासले
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

दोनों हाथों की लकीरों में लिख लूँ
मैं तुम्हें इस जहाँ से छीन लूँ
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

पागल, शैदाई, क़ातिल हूँ तेरे लिए
हाँ मेरी जान तुम्हें पाने के लिए
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

मुश्किलों को आसाँ करना आता है
मुझे हद से गुज़रना आता है
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

जो तुम्हें देखे उसका अंजाम हूँ
मैं और मैं ही तेरा मक़ाम हूँ
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

लहू के क़तरे-क़तरे में तुम हो
दिल में धड़कनों में तुम हो
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

जान हो, ज़िन्दगी हो, तुम मेरी
ख़ुदा से बन्दगी हो, तुम मेरी
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…

आओ तुमको अपना बना लूँ मैं
दिल, जान, सीने से लगा लूँ मैं
तुम मेरे हो, तुम मेरे हो…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आँखों में आँसू नहीं आते

आँखों में आँसू नहीं आते
क्योंकि मैं जानता हूँ
तुम लौटकर आओगी ज़रूर
यह दिल तन्हा कहाँ है
इसमें यादें हैं तुम्हारी
तुम रहो कितने भी दूर

देखता हूँ तुम्हें
जब भी आँखें मूँद लेता हूँ
और कोई कहाँ है इनमें हुज़ूर
तुमसे प्यार किया है
यह दिल का सौदा है तुम्हीं से
क्यों न रहूँ थोड़ा मग़रूर

पास आने के दिन आ गये
धड़कनों में बेक़रारी है
दिल में सुरूर ही सुरूर
वादियों में चले मौसम हरे
डालियों पर फूल गुलाबी हैं
निगाह में भर गया है नूर

जादू-सा है फ़िज़ाओं में
खिल रहे हैं ख़्याल हर-सू
क्यों न आये तुम्हारा मज़कूर
दिल बहलता नहीं बातों से
यह कैसा सिलसिला है
चैन आये गर आये वह हूर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३