सहर-ब-सहर मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ

सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2
कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें

न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना
मेरी मंज़िल तो बन गयीं अब ये राहें

है जो दर्द सो अब तन्हाई से है मुझे
असरकार हों, कुछ काम आयें दुआएँ3

न दोस्त न नासेह4 न चारागर5 न वाइज़6
कोई भी नहीं लेता अपने सर ये बलाएँ

जो जाते हैं अपना दामन छुड़ा के ‘नज़र’
कह दो कि जाते हैं तो सब कुछ ले जाएँ

शब्दार्थ:
1. एक सुबह से अगली सुबह तक, 2. किरण, 3. प्रार्थनाएँ, 4. नसीहत करने वाला, 5. इलाज करने वाला, 6. बुद्धिमान


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

इल्तिहाबे-दर्द से जलता है कलेजा

इल्तिहाबे-दर्द से जलता है कलेजा
कभी तेरी यादों को बिखराया कभी सहेजा

बयाँ दास्ताने-सोज़े-फ़ुगाँ किससे करूँ
सभी मेरे लफ़्ज़ देखते हैं न कि लहजा

सुकूनो-क़रारो-सबात से क्या मुझे
तू इस दिल के सौदे में मेरा सब कुछ ले जा

सदाए-राहे-मुहब्बत बुलाती है मुझको
दिमाग़ कुछ सोच के कहता है ठहर जा

गर्मिए-हौसले-जुनूँ का असर है यह
दिल करता है मुझपे नवाज़िशहाए-बेजा

अब तक न मेरे सलाम का कोई जवाब आया
तूने मुझको कोई ख़त भेजा कि न भेजा

ख़्याले-सुम्बुल से बीमार की बेक़रारी है
ऐ तबीब ‘नज़र’ को इसका इलाज दे जा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

अब ‘विनय’ तेरे ग़म से ग़ाफ़िल नहीं रहा

अब ‘विनय’ तेरे ग़म से ग़ाफ़िल नहीं रहा
देख तो वो मग़रूर वो संगदिल नहीं रहा

हमें कोई शिबासी दे हमने तेरा राज़ न खोला
पर जानाँ ये जान लो मैं बातिल नहीं रहा

तेरी कही सुनी सब मुझे वक़्त ने भुला दी
ये ग़ैर तेरी दुश्मनी के क़ाबिल नहीं रहा

हमें जब नाज़ थे तो ये दर्द किसलिए हैं
तेरे बाद कोई चेहरा मुस्तक़िल नहीं रहा

तुम हमसे पूछो वह शामे-माज़ी की तन्हाई
कभी कोई इतना दिल में दाख़िल नहीं रहा

तुमने ख़ुद मुझे अपना दोस्त बनाया होता
तुम्हें तो कोई काम कभी मुश्किल नहीं रहा

हमसे एक-एक कर सब हाथ छूटते गये
मेरे कूचे में वो माहे-कामिल नहीं रहा

सद्-हैफ़ो-अफ़सोस से कलेजा भर आया
हाए मुझे सिवा ग़म कुछ हासिल नहीं रहा

हमें कोई देता ताक़ते-नज़्ज़ाराए-हुस्न
सुना  है मेरी राह में कोई हाइल नहीं रहा

साँसों का धुँआ दिल को दर्द देता है बहुत
ज़िन्दगी में बाइसे-मसाइल नहीं रहा

वो गुफ़्त-गू वो मशविरे वो बयान अपने
ख़ुदा के ज़ख़्म देखे तो मैं बिस्मिल नहीं रहा

गर्दिशे-अय्याम की रवानी देखकर
मेरा दिले-सौदा मुज़महिल1 नहीं रहा

अब इस चमन में फिरती है खुश्क सबा
मस्जूदा कोई जल्वाए-गुल नहीं रहा

किसके दिन उम्रभर एक से रहते हैं
मुझमें तो वह हुस्ने-अमल नहीं रहा

मेरी काविश2 का किसी राह तो हासिल होगा
हैफ़ मेरे ग़म की कोई मंज़िल नहीं रहा

मैं अहदे-ज़ीस्त करके किससे तोड़ूँ
मुझे तफ़रकाए-नाक़िसो-कामिल नहीं रहा

मुझे तुम छोड़कर गये लेकिन क्या बताऊँ
एक अरसा बर्क़े-सोज़े-दिल नहीं रहा

तुमको जाना है तो जाओ कब हमने रोका है
किसी के जाने का ग़म हमें बिल्कुल नहीं रहा

इस दरया को ख़्वाहिश है समंदर की
और सहाब का बरसना मुसलसल नहीं रहा

सू-ए-शिर्क सजदे-मस्जूद किये मैंने
क्योंकि मैं तेरे कूचे का माइल3 नहीं रहा

अब किससे करूँगा उसकी जफ़ा का शिकवा
आज से कोई दराज़ दस्तिए-क़ातिल नहीं रहा

इस ज़र्फ़ कोई आये तो देखे हाल बीमार का
वो पुरसिशे-जराहते-दिल4 नहीं रहा

अच्छा हुआ तुमने रोज़े-आख़िर न बोला
रोज़े-विदा से कोई उक़्दाए-दिल नहीं रहा

दु:ख गिनते-गिनते उम्र कट जायेगी
किसी की इनायत किसी का तग़ाफ़ुल नहीं रहा

फ़िज़ा क्यों इतनी ख़ामोश है गुलशन में
क्या आशियाँ में नालाए-बुलबुल नहीं रहा

था तब मिला नहीं, खोकर मिलता है कौन
दिल मुझे ख़्याले-यारे-वस्ल नहीं रहा

मैं जिसको दोस्त कह नहीं सकता अब
मुझे उसके लिए जज़्बाए-दिल नहीं रहा

किसको खरोंचे हो अपने नाख़ून से तुम
इस सीने में कोई जराहते-दिल नहीं रहा

उर्दी-ओ-दै का अब मैं क्या ख़्याल रखूँ
ये कैसी जलन, मुझे तपिशे-दिल नहीं रहा

अपनी यकताई पर बेहद नाज़ था हमको
आज भी है लेकिन वो मुतक़ाबिल नहीं रहा

अब भी खिलती है शुआहाए-ख़ुर-फ़ज़िर 
मगर फ़िज़ा में शाहिद-ए-गुल नहीं रहा

बहुत ढूँढ़ा हमने उसके जैसा, न पाया एक
वो नमकपाशे-ख़राशे-दिल नहीं रहा

अब ख़ुल्द में रहें या दोज़ख में रहें हम
ऐ सनम मेरा तो आबो-गिल5 नहीं रहा

उस फ़ितनाख़ेज़ का नहीं अब डर मुझको
कि मेरे दिल में स’इ-ए-बेहासिल6 नहीं रहा

आँखों से निक़ाब उठाओ कि वहम खुल जाये
कि तुझमें वो तर्ज़े-तग़ाफ़ुल नहीं रहा

कहने को तो ज़ामिन नहीं मुझसा ज़माने में
पर जाने क्यों मुझे तहम्मुल7 नहीं रहा

वो जिसकी चाप से धड़कनें रुक जायें थीं
ज़िन्दगी में वो हौले-दिल नहीं रहा

ऐ लोगों मैं ख़ुद को किस ज़ात का बताऊँ
सुना है तुममें ज़रा भी दीनो-दिल नहीं रहा

दायम अपने बग़ल में पाओगे तुम हमको
चाहो तो कह लो मैं तुझमें मुश्तमिल8 नहीं रहा

क्यों है मुझको तेरे रूठ कर जाने का ग़म
जबकि जानते हो मैं कभी तेरा काइल नहीं रहा

कहता तो हूँ बात दिल की मगर क्या करूँ
मेरा कोई भी ख़्याल मानिन्दे-गुल नहीं रहा

उसकी ख़ामोश आँखों में अयाँ थीं बातें दिल की
वो चाहकर भी कभी सू-ए-दिल नहीं रहा

किया जो मैंने तुम्हें अपना समझकर किया
ये दिल तेरी जफ़ा से मुनफ़’इल9 नहीं रहा

मैंने देखा था उसे जाते ख़ुल्द की ओर
वो हलाके-फ़रेब-वफ़ा-ए-गुल नहीं रहा

जो कभी साहिल पर था कभी समंदर में
उसको दाग़े-हसरते-दिल नहीं रहा

जिसपे लिखा करते थे तुम अपना नाम
शख़्स वो आज गर्दे-साहिल नहीं रहा

आज फ़ारिग10 हूँ कि तुम हो मेरे ग़मख़्वार
मैं हरीफ़े-मतलबे-मुश्किल11 नहीं रहा

था तो थोड़ा बहुत मैं ये मानता हूँ लेकिन
आज उतना भी तो सोज़िशे-दिल नहीं रहा

मैं दर्द को दिल से जुदा कर सकता हूँ
पर फ़ुसूने-ख़्वाहिशे-सैक़ल12 नहीं रहा

अब मैं किस मुँह से जाऊँ बज़्म में उसकी
ये दिल दरख़ुर-ए-महफ़िल13 नहीं रहा

देखिए शाइबाए-ख़ूबिए-तक़दीर14 उसमें
वो दिन गया कि रोज़े-अजल नहीं रहा

इश्क़ फिरता था उस रोज़ गलियों-गलियों
आज किसी में इतना भी ख़लल नहीं रहा

बढ़के आया तो लगा तेरा तीर इस दिल में
चारासाज़ न हुआ पर जाँगुसिल15 नहीं रहा

किसपे लिखके भेजूँ मैं तुझे पयाम अपना
पास औराक़े-लख़्ते-दिल नहीं रहा

आस्माँ के पार जाने की तमन्ना थी उसको
पर आइना-ए-बेमेहरि-ए-क़ातिल16 नहीं रहा

मेरे मुँह से न सुनो वज्हे-सुखन ईसा
ख़ुद गुलों में रंगे-अदा-ए-गुल नहीं रहा

मगर टूटा है किसी का नाज़ुक दिल मुझसे
ये डर कि मैं क़ाबिले-सुम्बुल नहीं रहा

अब कोई रहनुमा नहीं रहे-इश्क़ में
तुम ख़ुश रहो तेरी राह में साइल17 नहीं रहा

शब्दार्थ:

१. निष्तेज २. कोशिश, द्वेष ३. अनुरक्त, आसक्त ४. दिल के ज़ख़्म का हाल पूछने वाला
५. शरीर और आकार ६. निष्फल प्रयत्न ७. दिल की घबराहट, सहनशक्ति ८. शामिल
९. लज्जित १०. निश्चिंत ११. कठिन काम कर लेने वाला १२. परिष्कृति की अभिलाषा का जादू १३. महफ़िल के योग्य १४. सौभाग्य की झलक १५. जानलेवा, दुखदायी
१६. माशूक़ की बेरहमी का सुबूत १७. उम्मीदवार, प्रश्नकर्ता


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५

ज़िन्दगी माने हो तुम

ज़िन्दगी माने हो तुम
साँसें तुम्हारा एहसास हैं
यादें बाइस हैं ज़ीस्त को
तेरी तमन्ना है खु़शी
ग़म है तेरी जुदाई
ज़ख़्मे-दिल ही मरहम
ज़ख़्मे-दिल ही दवा
और चारागर हो तुम…

आप ही हँसना है
आप ही रोना है
दिन-रात ख़्यालों में
तुमसे बातें करना
सब जीने का मतलब है
खा़ली सीने में दिल कहाँ है
वह तो तुम्हारे पास है
जो सीने में धड़कता है
महज़ तुम्हारा एहसास है

जब भी बेले की कली खुलती है
और गुलाब महकता है
यूँ एहसास होता है उसे छूकर
जैसे तुमको छू लिया है
तुम मुझसे नाआश्ना हो
मगर मैं तुमसे दूर नहीं
यह दूरियाँ यह फ़ासले
सब कम हो जायेंगे
बस तुम्हारे घर का पता मिले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४