You’re an angel

You’re an angel
Come to earth
Only for me
Most beautiful
In whole world
As one should be

You are my dream
That I wanted
In my life
I never found
Someone like you
You’re my type

Don’t take me wrong
If I got hurt you
Don’t be angry

You are an angel
Come to earth
Only for me
Most beautiful
In whole world
As one should be

Through my eyes
You look gorgeous
You look best
You are the one
Compare to whom
Beauty is dust

I was all alone
You turned me on
Thanking you gladly

You’re an angel
Come to earth
Only for me
Most beautiful
In whole world
As one should be


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

उदास शाम है और आँखों में नमी है

उदास शाम है और आँखों में नमी है
मैं बहुत तन्हा हूँ तेरी कमी है

आँखें हैं आँसुओं का एक समन्दर
दिमाग़ में यादों की बर्फ़ जमी है

बह रहा है वक़्त बहुत तेज़
ख़ाली सीने में इक साँस थमी है

क्या जला है शबभर ख़्यालों में
शायद मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

मुक़र जाता है ख़ुदा अपनी बात से
क्या वह भी कोई आदमी है?

मेरे प्यार को गर न मिलें तेरी बाँहें
तो मौत ही मुझको लाज़मी है

जो देखकर मुस्कुराते हैं मुझको
उनके मन में गहमागहमी है

सर्द बहुत बढ़ गयी है दिल में
ऊदी-ऊदी धूप बहुत सहमी है

क्या बुझाता रहा हूँ आज सारा दिन
क्यों दर्द की छुअन रेशमी है

किसी चोट से मेरा दिल टूटा नहीं
तेरी यादों से हुआ ज़ख़्मी है

मैंने उफ़क़ में ढूढ़े हैं तेरे रंग
शफ़क़ आज कुछ शबनमी है

सूखे हुए कुछ फूल पड़े हैं ज़मीं पर
फूलो-शाख़ का रब्त मौसमी है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ख़ुशबू बिछायी है राहों में

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ, तुम चले आओ
दिल बेक़रार है बहुत
तुम चले आओ, तुम चले आओ

मौसम बड़ा गुलाबी है
गुलाबी गुल हैं शाख़ों पर
अब और न तरसाओ

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ…

दिल धड़क रहा है
धड़क रही है नब्ज़-नब्ज़
धड़कनें और न बढ़ाओ

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ…

बरखा बहार आयी है
बरस रही है धरा पर
अब और न तड़पाओ

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ…

आँचल उड़ाकर अपना
चेहरा दिखा दो
न चुराओ नज़र, न चुराओ

ख़ुशबू बिछायी है राहों में
तुम चले आओ…
दिल बेक़रार है बहुत
तुम चले आओ…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला

यह बता मुझको! तुझको मुझसे क्या गिला
मुझको हर गाम नीचा दिखाके क्या मिला
हर वक़्त इम्तिहान और बस इम्तिहान
मुझको राहे-ख़ुदा में और कुछ भी न मिला

ख़ाली सीने में दर्द ही ज़मीं दर्द ही आसमाँ
दूर तक राहों में दर्द के निशाँ बस निशाँ
बाहर आ गया जिगर फाड़ के क़तराए-लहू
ऐ ख़ुदा तूने दिया मुझको किस बात का सिला

हँसना मुझे रक़ीब का’ तीर-सा लगता है
रखे अगर वह बैर मुझसे रखता है
जाने उसकी आँखों में मैं खटकता हूँ कि नहीं
ऐ ख़ुदा हर बार मैं ही क्यों मूँग-सा दला

राहे-इश्क़ में मुझे पत्थर का दिल नहीं
ज़ीस्त यह गँवारा मुझे बिल्कुल नहीं
मैं ख़ुदा को किसका वास्ता देकर कहूँ कि बस!
ख़ुदा-ख़ुदा कहने से हासिल कुछ भी न मिला

अपने ज़ख़्मों पे ख़ुद आप मरहम रखूँ
यह दर्द अगर कहूँ तो आख़िर किससे कहूँ
बात-बात पे ख़ुद से बिगड़ना आदत बन गयी
दरबारे-ख़ुदा से मुझको कुछ भी न मिला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

दरख़्त की शाख़ों पर
धूप की बूँदें नहीं
सूरज का दरिया है

छोटी-छोटी
नन्हीं मासूम बेलें
शाख़ों से खुलकर
तड़फड़ाने लगीं…

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

पाँव सूखे थे
ज़मीं ने सोख लिये
मुड़के देखा तो
निशाँ कहीं न थे

रात आयी तो
चाँद बरसने लगा
सहर फिर मुझे
आज़माने लगी

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २५ अप्रैल २००३