वह मुझको मुआफ़ रखे दुनिया के मामलों से

वह मुझको मुआफ़1 रखे दुनिया के मामलों से
मैं अब कभी किसी और से इश्क़ न करूँगा

दिल मेरा चाहे हो जाये टूटकर टुकड़े-टुकड़े
इस ग़म में आँखों को तर ऐ अश्क! न करूँगा

जो देखा है उस का चेहरा मैंने दो ही रोज़
इस बात का अपने ख़ुदा से रश्क2 न करूँगा

मेरे दिल में है तेरे ख़ाबों का इक भँवर-सा
जो हुआ यह दरया सो उसे खुश्क3 न करूँगा

दिल की दहलीज़ के भीतर रहेंगे मेरे ख़ाब
ख़ाबों को ज़ाहिर कभी मानिन्दे-मुश्क4 करूँगा

शब्दार्थ:
1. माफ़, forgive; 2. रश्क़ या रश्क, ईर्ष्या, envy; 3. सूखा, dry; 4. महक की तरह, like the smell


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी

जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी
उन आँखों में छिपी एक उजली रात थी

जब देखा था मंज़रे-हसीन-हुस्न1 मैंने
उस लम्हा चाँद था और सितारों की बरात थी

साहिब हमें दाँव-पेंच नहीं आते इश्क़ में
और वह प्यार की पहली दूसरी हर मात थी

वह शब2 नहीं भूले जब घर आये थे तुम
उफ़! वह निगाह की निगाहों से मुलाक़ात थी

हम ने दर्द पहने, ओढ़े और बिछाये हैं
एक नयी जलन की यह एक नयी शुरूआत थी

हमने जिसे दिल में जगह दी उसने दग़ा3 किया
हर एक मतलबी की अपनी एक ज़ात थी

रात बादल नहीं थे और चाँद भी रोशन था
साथ हो रही उस की यादों की बरसात थी

जिसने मुझे छूकर तख़लीक़4 किया है ‘नज़र’
गोया5 वह भी इक नज़रे-इल्तिफ़ात6 थी

शब्दार्थ:
1. हसीन हुस्न वाले मंज़र; 2. रात; 3. धोख़ा; 4. आस्तित्व में लाना; 5. जैसे; 6. दोस्ती की नज़र


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

यह सोज़गाह है कि मेरा दिल है

यह सोज़गाह1 है कि मेरा दिल है
मुझको जलाने वाला मेरा क़ातिल है

जिसे देखकर उसे रश्क़2 आता है
वह कोई और नहीं माहे-क़ामिल3 है

जिसने मुझको कहा सबसे अच्छा
वह कोई पारसा4 है या बातिल5 है?

तुम जाने किस बात पर रूठे मुझसे
लहू में ग़म हर क़तरा शामिल है

मेरा यह दिल आ गया तुम पर
तू मेरी पुरनम6 आँखों का हासिल है

मुझसे रूठकर दुनिया बसा ली
मेरा यार मुझसे ज़ियादा क़ाबिल है

वह उसके लिए मेरा मुक़ाबिल7 था
आज वह ख़ुद उसका मुक़ाबिल है

वह ग़ज़ल में अस्लूब8 ढूँढ़ता है
‘नज़र’ वाइज़9 भी कितना जाहिल10 है

शब्दार्थ:
1. दिल की जलन का स्थान 2. ईर्ष्या 3.पूरणमासी का चाँद 4. महात्मा 5. झूठा, जिसकी बात की कोई मान्यता न हो 6. गीली, भीगी 7. शत्रु 8. नियम, शैली 9. बुद्धिजीवी 10. अनपढ़ की तरह बर्ताब करने वाला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं

तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं
तेरे हुस्न के पीछे पागल हूँ मैं
शैदाई दीवाना आवारा बादल हूँ मैं
तेरे तीरे-नज़र का घायल हूँ मैं

तेरे ख़ाब पलकों में छिपाये फिरता हूँ
गिर न जायें आँसू बनके डरता हूँ
यह है इब्तदा-ए-सहर-ए-मोहब्बत
इन्तहाने-इम्तिहाँ के लिए मरता हूँ

ऊदी-ऊदी साँसों से सीने में जलन है
सूखा-सूखा मेरे दिल का गुलशन है
हैं दूर तक वदियों में पानी की तहें
फिर किसके लिए प्यासा मेरा मन है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

पूनम थी शाम जिसने देखा मुझे

पूनम थी शाम जिसने देखा मुझे
मैंने उसकी नज़र को उसने मुझे,

और चाँद रातभर रश्क करता रहा!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४