Go go where you wanna go

Go go where you wanna go
And say no every time no
Go go where you wanna go

To break heart there’s friends
So follow some new trends
Take aside all the row

Go go where you wanna go
And say no every time no

Love is not to have inside
This thing is of pride
A colourful rainbow

Go go where you wanna go
And say no every time no

Sun is rising of mine
Salt of my eyes is crying
Is something to through n’ fro

Go go where you wanna go
And say no every time no

My heart is beating & beating
Name of you is repeating
I’m in dilemma of ‘yes’ or ‘no’

Go go where you wanna go
And say no every time no

In words how I can explain
You are trying me in vain
There’s thunder lighting n’ glow

Go go where you wanna go
And say no every time no


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004

वह शाम फिर आयी

वह शाम फिर आयी
वह गुलाबी चाँद फिर आया
वह फिर ढहीं बारिश की दीवारें
इल्ज़ाम मुझपर आया

कोई गुमाँ नहीं हुआ
कोई ज़ख़्मे-निहाँ नहीं पिया
सब बयाँ हैं
किसलिए दर्द असर पाया

वह शाम फिर आयी
वह गुलाबी चाँद फिर आया

मुझको यह नुमाया है
ख़त किसलिए जलाया है
शबो-रोज़ के पुरज़े क्यों किये
क्यों यह ज़हर खाया

वह शाम फिर आयी
वह गुलाबी चाँद फिर आया

इक उम्र दराज़ कर दो
आँखों में मिराज़ भर दो
यों भी जी लूँ कुछ देर तलक
क्या दीवारो-दर, क्या साया

वह फिर ढहीं बारिश की दीवारें
इल्ज़ाम मुझपर आया

दौरे-ग़म, यह तन्हाई रग-रग में
यह ज़ख़्म के निशाँ
और क्या मेरी…
दुआ के हिस्से असर पाया

वह फिर ढहीं बारिश की दीवारें
इल्ज़ाम मुझपर आया

जब विसाल लम्हा था
तो फ़िराक़ उम्र क्यों है
क्या कुसूर उसके सर
क्यों जिये उम्रे-नज़र ज़ाया

वह शाम फिर आयी
वह गुलाबी चाँद फिर आया
वह फिर ढहीं बारिश की दीवारें
इल्ज़ाम मुझपर आया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

एक गिरह ज़ुबाँ में

एक गिरह ज़ुबाँ में, सब के होती है
वक़्त लगते ही लफ़्ज़ अटका देती है
लोग क्या समझते हैं
मैं ना-पाक हूँ या मौक़ापरस्त!
अजब माहौल है, इस मेरी जा का
कि मीर जैसा ज़हन किसी का नहीं

एक मज़ाक़ लगता हूँ,
या लोग मुझको मज़ाक़ बनाते हैं
सामने कुछ-का-कुछ कह के
पीठ पीछे मुस्कुराते हैं…
सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है
हमें भी परखना है जहाँ,
चलो हर ज़ुबाँ की गिरह गिनते हैं
हलक़ से उतरे या न उतरे सच
हम बेफ़िक्र रहते हैं…

मेरे जानिब जो झुकते हैं,
मुझसे तरक़ीब रखते हैं…

‘मतलब से ही खुलते हैं ज़हन के दरवाज़े
मतलब से ही बंद होते है दिलों के कपाट
समझ कि तेरा यार कोई नहीं होगा-
वजहसार बन ‘नज़र’ तन्हा वक़्त काट’

यह पुरज़े जो उतरे हैं तेरी कलम से ‘विनय’
सफ़्हों पे उतर के खु़द बयाँ हुआ है तू… 

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

दोस्त, माफ़ कर देना मुझे

तुमने पुकारा था जब
मैंने सुना तो था
मगर मेरा ग़ुरूर
मेरे ज़हन पे यूँ चढ़के बैठा था
कि मैंने देखा भी न तेरे जानिब

जाने किस मशक्कत में
रहा होगा तेरा दिमाग़
जाने तुमने क्या-क्या न सोचा होगा
दुबारा जब तुमने
निगाह चुराके देखा था
उस वक़्त भी तो मैं
ग़ुरूर को आगोश में लिए गुज़रा था

वक़्त की नब्ज़ तो
बहुत भारी लग रही थी
उस पहर मुझे…
जाने किस ख़्याल को
बाँहों में भरकर
तुम घर जा रहे थे

पहुँचा तो था मैं
मगर देर से पहुँचा था
वो दिन का चाँद
मेरी हथेली से फिसल चुका था,
जा चुका था…

“कल फिर मिलना होगा
कल फिर नये बहाने होंगे
कोई इशारा बयाँ होगा
लफ़्ज़ तुम्हें नये बनाने होंगे”

दोस्त, माफ़ कर देना मुझे
जो ज़रा भी ग़ुबार हो मन में…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

तेरे चेहरे ने शिकन लफ़्ज़ों में बयाँ की होगी

तेरे चेहरे ने शिकन लफ़्ज़ों में बयाँ की होगी
कोई यूँ ही तो ख़ुद इतना फ़ुर्त नहीं होता है
लम्हा-लम्हा ख़ला-सी आँखों में क्या बदलता है?
कोई चेहरा आता है आँखों में आकर फिसलता है

बड़ा अजनबी जाना हमको जो सामान लौटा रहे हो
क्या रु-ब-रू होने वालों से कोई अजनबी होता है
मुतमइन-सा हूँ खु़द से, तेरा भी कसूर क्या है?
इस जहाँ में इक मेरे साथ ही ऐसा होता आया है

ज़बाँ से चखा है, जबसे तेरा नाम, हाँ तुम्हारा!
मुझे मिसरी की मिठास वह लज़्ज़त याद आयी नहीं
मेरी ज़ुबाँ का लहज़ा हर वक़्त खु़शनुमा रहता है
लोग कहते हैं मैं बदल गया हूँ, तुमने बदल दिया है

बेरब्त मेरी तक़दीर थी उसने तुमसे राब्ता पा लिया है
तेरे क़रीब होने से यह धुँध आँखों में भरा रहता है
तुम जब मेरे पास आकर बैठती हो लोग ताने कसते हैं
तुम्हें यह पता नहीं या तुम भी उन्हीं में शामिल हो?


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२