काश कि फिर वह सहर आती

काश कि फिर वह सहर आती
जब तू मुझे नज़र आती

तेरी आरज़ू है मुझे रात-दिन
कभी तू इस रहगुज़र आती

पलकें सूख गयीं राह तकते
तेरी कोई खोज-ख़बर आती

दरम्याँ रस्मो-रिवाज़ सही
तू फिर भी इधर आती

सहाब दिखे हैं सूखे दरया पे
कभी बारिश भी टूटकर आती

मौतें मरकर मैंने देखी हैं
कभी ज़िन्दगी मेरे दर आती

क़रार आ जाता पलभर के लिए
मेरे ख़ाबों में तू अगर आती

सहर: संध्या, सुबह, dawn, morning | सहाब: बादल, clouds


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

न वह कभी आँखों से उतारा ही गया

न वह कभी आँखों से उतारा ही गया
और न कभी लबों से पिया ही गया
वह इक दर्द का बवण्डर था शायद
न जिसे कभी दिल में सँभाला ही गया

इक कहकशाँ की रोशनी भी खप गयी
न ज़रा पलकों को झपकाया ही गया
आधे-आधे दिल से देखा था मैंने उसे
न वह कभी पूरे दिल से देखा ही गया

तारीक़ी ने सिर्फ़ मेरे पाए ही चुने
और न कभी मुझसे भागा ही गया
टुकड़े कर दिये उसने मेरी आँखों के
न यह ग़म मुझसे भिगोया ही गया

धीरे-धीरे वह मुझसे दूर चलता गया
न मुझसे उसके क़रीब जाया ही गया
बारिश ने खनका दीं शीशम की पत्तियाँ
न रोकर इस दिल को बहलाया ही गया

पाए:feet,  तारीक़ी: darkness


 शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

वक़्त का पहना उतार आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये

ख़ाबों में सही अपना तो माना
दिल को मेरे अपना तो जाना

खट्टे-मीठे रिश्ते चख लिये हैं
कुछ सच्चे पलकों पे रख लिये हैं

ख़ाहिशों का बवण्डर है दिल
दिल को उसके दर पे छोड़ आये

तेरी रज़ा क्या मेरी रज़ा क्या
वफ़ाई-बेवफ़ाई की वजह क्या

दस्तूर-ए-इश्क़ से रिश्ते हुए हैं
दिलों में रहकर फ़रिश्ते हुए हैं

ख़ला-ख़ला सजायी एक महफ़िल
महफ़िलों से उठके चले आये

वक़्त का पहना उतार आये
कुछ लम्हे मरके गुज़ार आये


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं

आइने रातभर रोते रहे
तस्वीरें रातभर जागती रहीं
लम्हे उम्रभर सिसकते रहे
ख़ामोशियाँ उम्रभर ख़ाक फाँकती रहीं

यादें धूप में सूख रही हैं
बातें सब मुरझा गयी हैं
आँखों में दरार पड़ रही है
सपने बंजर हो गये हैं

आँसू बर्फ़ बन गये हैं
ख़ाहिशें तिनके चुन रही हैं
आरज़ू के पाँव थक चुके हैं
ख़्याल ज़मीन में दफ़्न हो गये हैं

साँसें सीने में भीग गयी हैं
उदास सावन टपक रहा है
जंगल तन्हाई में सुलगता है
फूल पलकें झुकाये हुए हैं

ख़ुशबू बे-सदा गल रही है
पलाश के फूल हँस रहे हैं
जड़ें मिट्टी सोख रही हैं
पत्ते सूखी बेलों ने डस लिये हैं

उजाले पत्थरों में जज़्ब हो गये हैं
चाँद धुँध हो रहा है
रात रेत हो गयी है
सितारे रेत के दरया में बह रहे हैं

दर्द तेज़ाब हो गया है
और खु़शी मग़रूर रहती है
मैं शब्द उगलता रहता हूँ
ज़िन्दगी के हर्फ़ बदल गये हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’