अपनी क़िस्मत पे नाज़ करते

अपनी क़िस्मत पे नाज़ करते, ग़ुरूर होता
जो कभी तेरे लबों से हमारा मज़कूर होता

अगरचे हमने छुपाया राज़े-दिल तुम से
डर था तेरी निगाह में यह ना क़ुसूर होता

तुमसे कुछ न कहा इसमें ख़ता हमारी थी
बताता दर्दे-हिज्र जो ना मजबूर होता

क़िस्सा-ए-इश्क़ मुख़्तसर था बहुत
इक और मोड़ होता तो ज़रा मशहूर होता

तुमने मुझे देखकर जाने क्या सोचा होगा
काश मैं शक्ल से ख़ूबसूरत थोड़ा और होता

क्या हम ना पाते अपनी मोहब्बत को
गर हमें अपनी वक़ालत का शऊर होता

हम-तुम मिल ही जाते सनम इक रोज़
जो इश्क़ में आशिक़ों का मिलना दस्तूर होता

हैं आलम में वही रंग नये-पुराने, यादों के
तुम भी होते परेशाँ तो मज़ा ज़रूर होता

तड़प-तड़प के मैंने यह ग़ज़ल लिखी है
काश मेरी क़िस्मत में वह जमाले-हूर होता

पल-पल बिगड़ रहा है हाल तेरे बीमार का
ऐ ‘नज़र’ काश कि आज को वह न दूर होता


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००

मुझसे कोई प्यार कर ले

मुझसे कोई प्यार कर ले
दिल अपना देकर, दिल मेरा ले ले
मुझसे कोई प्यार कर ले…

तन्हाइयों का दर्द छुपा रखा है
इसे कोई कभी दो आँखों से चुरा ले
मुझसे कोई प्यार कर ले…

यह हसीं जज़्बात टिके हुए हैं लबों पे
इन्हें कोई अपने लबों से चख ले
दिल अपना देकर, दिल मेरा ले ले
मुझसे कोई प्यार कर ले…

दु:ख यह मेरा दु:ख कब चुकेगा
तूफ़ान यह दिल में कब रुकेगा
मुझपे कोई एतबार कर ले
मुझसे कोई प्यार कर ले…

चेहरा जो दिल को अपना लगेगा
समा जो बस इक सपना लगेगा
वह उस ख़ाब में मुझको बुला ले
मुझसे कोई प्यार कर ले…

वह हुस्न की जादूगरी हो न हो
वह महजबीं या परी हो न हो
बस मुझे अपनी तक़दीर बना ले
मुझपे कोई एतबार कर ले…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आँखों में आँसू नहीं आते

आँखों में आँसू नहीं आते
क्योंकि मैं जानता हूँ
तुम लौटकर आओगी ज़रूर
यह दिल तन्हा कहाँ है
इसमें यादें हैं तुम्हारी
तुम रहो कितने भी दूर

देखता हूँ तुम्हें
जब भी आँखें मूँद लेता हूँ
और कोई कहाँ है इनमें हुज़ूर
तुमसे प्यार किया है
यह दिल का सौदा है तुम्हीं से
क्यों न रहूँ थोड़ा मग़रूर

पास आने के दिन आ गये
धड़कनों में बेक़रारी है
दिल में सुरूर ही सुरूर
वादियों में चले मौसम हरे
डालियों पर फूल गुलाबी हैं
निगाह में भर गया है नूर

जादू-सा है फ़िज़ाओं में
खिल रहे हैं ख़्याल हर-सू
क्यों न आये तुम्हारा मज़कूर
दिल बहलता नहीं बातों से
यह कैसा सिलसिला है
चैन आये गर आये वह हूर


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

पहली नज़र का पहला प्यार

पहली नज़र का पहला प्यार कर गया दीवाना
मेरा दिल यह बेचारा हो गया आशिक़ाना
आँखों में बेताबी है, चैन कहाँ है
डरता हूँ कहीं कोई बन जाये ना अफ़साना

फूल हँसें हैं सारे, दिल धड़का है
ठण्डी साँसों में जैसे शोला भड़का है
उसका चेहरा चाँद है, नूर है
लड़की नहीं वह इक हूर है
थाम के दिल मैं राहों में खड़ा हूँ कि
हो जाऊँ उसके तीरे-नज़र का निशाना

पहली नज़र का पहला प्यार कर गया दीवाना
अब मैं दिल में उसके बनाऊँगा आशियाना
वह मेरी अब इक मंज़िल है
उसकी बाँहो के सिवा कहाँ कोई मेरा ठिकाना

उसको देखकर जी नहीं भरता है
कैसे जताये उसे उस पर मरता है
भोली-भाली वह सबसे जुदा है
सबसे निराली उसकी अदा है
आये वह कभी जो मेरी दुनिया में तो
छोड़ दूँ उसके लिए मैं यह सारा ज़माना

पहली नज़र का पहला प्यार कर गया दीवाना
मेरा दिल यह बेचारा हो गया आशिक़ाना


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ०८ मई २००३

नींद गहरी है रात ठहरी है

नींद गहरी है रात ठहरी है
आज ख़ाबों की बग़िया हरी है
चाँद खिला है पेड़ पर
पेड़ के नीचे एक लड़की है

वह मेरी जाने-जाँ है
वह मेरी मोहब्बत का जहाँ है
ढूँढ़ने चला मैं उसको
आख़िर मेरी दुनिया कहाँ है

रोज़-रोज़ गली-गली
हर चौराहे मैं धूल बनके उड़ा
कभी अपनों से मिला
अजनबी और ग़ैरों से जुड़ा

तेरे बिना दिल तन्हा है
तू चाँद है, ख़ुश्बू है, सुबह है
यह ज़िन्दगी अधूरी है
बहती एक आँधी की तरह है

रोज़ तन्हा बैठता है चाँद जहाँ
वह मेरे घर की एक खिड़की है

उसे फूलों के बाग़ों में देखा है
तितलियों-सा उड़ते देखा है
वह हँसती है फूल खिलते हैं
उसे फूलों में खिलते देखा है

मैं सारा दिन ख़्यालों में उड़ता हूँ
वह कोई रूबीना है कोई परी है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १७ अप्रैल २००३