गुलाबी चाँद ने याद किया है तुझे

गुलाबी चाँद ने याद किया है तुझे
एक दर्द का टुकड़ा दिया है मुझे

जिसके साथ बैठा हूँ आज की शाम
ज़हन से जाता नहीं तेरा नाम

आँखें ख़िज़ाँ के ज़र्द पत्तों-सी हैं
तन्हाइयाँ दिल में रहने लगी हैं

रूठ गया है वक़्त का हर लम्हा
फिर कर गया है मुझको तन्हा

नहीं देखा तेरा चेहरा आज की शाम
किसके सर जायेगा यह इल्ज़ाम

ख़ुदा आप जाने बन्दे पर रहमत
किसने खींची है लकीरों में क़िस्मत

मेरा दिल बना है रेत का दरिया
तुझसे मिलने का कौन-सा ज़रिया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
शाख़ों पर हैं नयी कोंपलें
जब से मौसमे-फ़ुर्क़त गुज़रा है

पुरवाइयाँ तन-बदन पे आग लगती हैं
तन्हाइयाँ मेरे ज़हन से ख़ौफ़ रखती हैं
निगाह में तस्वीरे-यार सजा ली जब से
रंगीनियाँ दिल को ख़ुशगँवार लगती हैं…

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
बेलों पर महके गुच्छे
जब से हुआ यह मौसम हरा है

मेरी बेक़रारियाँ आज क़रार पाने लगी हैं
यह धड़कनें तेरा नाम गुनगुनाने लगी हैं
इक अजब भँवर-सा उमड़ा है ख़्यालों का
ख़ाबों ख़्यालों की भीड़ राह पाने लगी है…

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
पैमाने सारे भर गये हैं
बादाख़ार हुआ यह दिल ज़रा है

सूरज है हुस्न उसका, जलाता है मुझको
बदन रेशमी चाँद जैसा, लुभाता है मुझको
तक़दीर जो उसने ‘ जोड़ ली है मुझसे
आज मौसम बहार का, बुलाता है मुझको…

मस्तियाँ ही मस्तियाँ हैं
जब से मौसमे-ख़िज़ाँ उतरा है
मेरे लिए उसकी चाहत
आज तो उसका दिल भी ख़रा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना

राहे-इश्क़ में मुश्किल ही सही पार उतरना
मगर हम शोलों पर भी चलकर जायेंगे
हमें तो चाह है तेरे इश्क़ की रोज़े-अव्वल से
तुम नहीं जानते क्या कर गुज़र जायेंगे

है हर गुल को छूने से तेरा लम्स हासिल
मगर यह चमन इक रोज़ बिखर जायेंगे
लम्हे यह बहुत उदास-उदास हैं तुम बिन
तुम आओगे रंगो-शाद से निखर जायेंगे

मेहरबानिए-इश्क़ कभी तुम हमसे निबाहो
हम बिगड़ी क़िस्मत हैं सँवर जायेंगे
मरना तो एक न एक दिन सबको है हमदम
जान लो तेरे इश्क़ की ख़ातिर मर जायेंगे

सदफ़ में गौहर की तरह दिल में तुम रहते हो
ज़ीस्त है तुमसे, तुम बिन ज़रर जायेंगे
ख़ातिर से अपने तुम नवाज़ दो हमको मेहरबाँ
तेरे दिल तक आँसुओं में बहकर जायेंगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

आहिस्ता-आहिस्ता नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं

आहिस्ता-आहिस्ता नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं
आहिस्ता-आहिस्ता तुमसे राहें जुड़ने लगीं
आहिस्ता-आहिस्ता तुमसे प्यार हो गया
आहिस्ता-आहिस्ता दोनों निगाहें लड़ने लगीं

तुमसे कहना था संग तेरे जीना है मुझको
प्यार को तुम्हारी आँखों से पीना है मुझको
ज़िन्दगी क्या है तुमसे मिलके जाना मैंने
सिवा तुम्हारे दिल के’ चैन कहीं न है मुझको

वह पहली नज़र और वह दिलकश समाँ
वह हुस्नो-अदा और वह मौसम ख़ुशनुमा
बदला-बदला है सब कुछ आज भी यहाँ
यह दिल, यह धड़कन, यह नीला आसमाँ

तुमने दिल लेकर मेरा क्यों न अपना दिया
हाँ मेरी ज़िन्दगी को इक नया सपना दिया
तेरी चाहत सनम मेरी क़िस्मत बन गयी
जो आशिक़ तुमने मुझको अपना बना दिया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा

वज़नी साँसों में पिस रहा है दिन सारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

नम है नफ़स-नफ़स मेरे सीने में
क्यों खर्च नहीं होती साँस जीने में

मेरी बाक़ी ज़िन्दगी का तुम ही सहारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

नामे-इश्क़ जायेगा मेरा सब-कुछ
क़िस्मत क्यों नहीं कहती आज कुछ

नाख़ुदा कश्ती को कब मिलेगा सहारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

‘नज़र’ को नयी ज़ीस्त दी तुमने शीना
जीने का तुमने सिखाया मुझको क़रीना

तेरे ही साथ मैंने हर लम्हा गुज़ारा
मुझे आज भी है इन्तिज़ार तुम्हारा

वज़नी: heavy; नफ़स: breath; नाख़ुदा: boater, sailer;
ज़ीस्त: life; शीना: shine; क़रीना: style


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४