ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए
दिल के कोने-कोने तक छितरे हुए

वह अब कहाँ बाक़ी जो था मुझमें
मैं अब कहाँ ढूँढू जो था तुझमें
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

भीगी-भीगी थी ज़मीं सूखे पाँव थे
जलते-बुझते पुराने घाव थे
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

जुगनू दो आँखों में तिरने लगे हैं
चिन्गारियों से चुभने लगे हैं
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए

बुझते हुए दिए को जलाऊँ कैसे
दबी हसरतों को बुझाऊँ कैसे
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४