उसकी आँखें

मैंने कभी उससे बात नहीं की मगर क्यों उसकी आँखें मुझको पहचानती हैं?
क्या जानती हैं मेरे बारे में, क्या जानना चाहती हैं उसकी आँखें?
कभी आश्ना तो कभी अजनबी लगती हैं उसकी आँखें, मानूस आँखें!

उसकी आँखें पहचानती हैं मुझे, मगर कुछ कहती नहीं…
वो गुज़रती है जितनी बार सामने से –
एक बार तो मुड़ती हैं, उठके झुक जाती हैं, उसकी आँखें

उनकी कशिश कमसकम एक दफ़ा तो अपनी जानिब खींच ही लेती है
मेरी बेज़ुबाँ आँखें चाहकर भी उससे कह नहीं सकतीं कि…
उसकी आँखें कितनी ख़ूबसूरत हैं, उसकी आँखों की कोई तफ़सील नहीं…

(DB के नाम)
Penned on 31 Dec 2004

सहर-ब-सहर मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ

सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2
कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें

न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना
मेरी मंज़िल तो बन गयीं अब ये राहें

है जो दर्द सो अब तन्हाई से है मुझे
असरकार हों, कुछ काम आयें दुआएँ3

न दोस्त न नासेह4 न चारागर5 न वाइज़6
कोई भी नहीं लेता अपने सर ये बलाएँ

जो जाते हैं अपना दामन छुड़ा के ‘नज़र’
कह दो कि जाते हैं तो सब कुछ ले जाएँ

शब्दार्थ:
1. एक सुबह से अगली सुबह तक, 2. किरण, 3. प्रार्थनाएँ, 4. नसीहत करने वाला, 5. इलाज करने वाला, 6. बुद्धिमान


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है

तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है
रह-रहकर रुक-रुककर बार-बार उठती है

हम बीमारि-ए-इश्क़ के मारे हुए हैं और
तेरी नज़र पैनी हो कर बार-बार उठती है

नाज़ो-नख़्वत1 के पैमाने किस तरह उठाऊँ
नज़र उठती है तो ज़िबह2 को यार उठती है

हम देखते हैं तेरे जानिब3 प्यार की नज़र से
तेरी नज़र, उफ़! मानिन्दे-कटार4 उठती है

ग़ैर से तुम को मोहब्बत हुई है बे-वजह
और फिर भी नज़र बाइसे-गुफ़्तार5 उठती है

हैं चमन में और भी नज़ारे ऐ ‘नज़र’ लेकिन
फिर क्यों तेरी नज़र सिम्ते-यार6 उठती है

शब्दार्थ:
1. नाज़ और नख़रे; 2. लड़ाई, क़त्ल; 3. ओर, तरफ़; 4. तलवार की तरह (आवाज़ करती हुई); 5. बात करने के लिए; 6. प्रेयसी की तरफ़


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उसने हमसे कभी वफ़ा न की

उसने हमसे कभी वफ़ा न की
और हमने भी तमन्ना न की

बहुत बोलते हैं सब ने कहा
सो आदत-ए-कमनुमा न की

बहुत आये बहुत गये मगर
जान किसी पर फ़िदा न की

उसने कही और हमने मानी
उसकी कोई बात मना न की

ख़ता-ए-इश्क़ के बाद हमने
फिर कभी यह ख़ता न की

बात थी सो दिल में रह गयी
सामने पड़े तो नुमाया न की

जिससे मुँह फेर लिया हमने
फिर कभी बात आइंदा न की

उम्मीद मर गयी सो मर गयी
वह बाद कभी ज़िन्दा न की

चोट दोस्ती में खायी है ‘नज़र’
किसी से नज़रे-आशना न की


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

Go go where you wanna go

Go go where you wanna go
And say no every time no
Go go where you wanna go

To break heart there’s friends
So follow some new trends
Take aside all the row

Go go where you wanna go
And say no every time no

Love is not to have inside
This thing is of pride
A colourful rainbow

Go go where you wanna go
And say no every time no

Sun is rising of mine
Salt of my eyes is crying
Is something to through n’ fro

Go go where you wanna go
And say no every time no

My heart is beating & beating
Name of you is repeating
I’m in dilemma of ‘yes’ or ‘no’

Go go where you wanna go
And say no every time no

In words how I can explain
You are trying me in vain
There’s thunder lighting n’ glow

Go go where you wanna go
And say no every time no


Words by: Vinay Prajapati
Penned: 2004