उलझे हुए दिल में तेरी कमी-सी क्यों है

उलझे हुए दिल में तेरी कमी-सी क्यों है
क्या बात है आँखों में नमी-सी क्यों है

तेरी किस बात से यह दिल थम गया
दिल में हर धड़कन सहमी-सी क्यों है

क्या हुआ किस बात से ये दिल टूट गया
टूटे हुए दिल में ये नरमी-सी क्यों है

हमने देखा है तुम्हें हमें देखते हुए
चाहत में इतनी ग़लतफ़हमी-सी क्यों है

रूठे तुम तो फिर मानते भी नहीं हो
तेरे मिज़ाज में इतनी गरमी-सी क्यों है

Shayir: Vinay Prajapati Nazar
Penned on 01 January 2005

वह जब भी इस गली इस डगर आये

वह जब भी इस गली इस डगर आये
मेरी ज़िन्दगी की सहर1 बनकर आये

शबो-रोज़2 जलता हूँ मैं इन अंधेरों में
वह मेरे लिए कुछ रोशनी लेकर आये

आया था पिछली बार अजनबी बनकर
अब कि बार वह मेरा बनकर आये

हूँ बहुत दिनों से शाम की तरह तन्हा
कोई मंज़र-ए-सोहबत3 नज़र आये

दरवाज़े पे खड़ा हूँ इक यही आस लिये
वह मेरी बे-सदा4 आह सुनकर आये

मंदिर-मस्जिद जाकर सर नवाया5
अब तो मेरी दुआ में कुछ असर आये

खिले हैं गुलशन में हर-सू6 गुल-ही-गुल
वह आये तो मेरा चेहरा निखर आये

मुद्दत से देखी नहीं शुआहा-ए-फ़ज़िर7
आँखें खोलूँ गुलाबी मखमली सहर आये

शफ़क़-ओ-उफक़8 के रंग कैसे देखूँ
मेरी आँखों में कोई पुराना मन्ज़र आये

मैं तंग गलियों में तन्हा-सा फिरता हूँ
क्यों मेरे ख़ुदा को रहम मुझ पर आये

या दिल यह धड़कना बंद कर दे मेरा
या इस दिल पर मुझ को ज़बर9 आये

तुझे भेजूँ किस पते पर पयाम10 अपना
कि मुझ तक मेरी कुछ ख़बर आये

मैंने नहीं बदला अपना घर आज तक
उम्मीद कि वह शायद कभी घर आये

मिलें उसको हर तरह से ख़ुशियाँ हमेशा
और उस की हर बला मेरे सर आये

है बहुत प्यासी यह ज़मीन-ए-दिल11
कभी मुझ पर भी बारिश टूटकर आये

ऐ ‘नज़र’ उस को कुछ न कहे दुनिया
हो यह कि हर इल्ज़ाम मुझ पर आये

शब्दार्थ:
1. सुबह; 2. रात और दिन; 3. दोस्ती का मंज़र; 4. मौन; 5. सर झुकाया; 6. सभी ओर; 7. भोर की (लालिमा युक्त) किरणें; 8. सुबह और शाम (के आकाश का गुलाबी रंग); 9. नियंत्रण; 10. संदेश; 11. दिल रूपी पृथ्वी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी

जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी
उन आँखों में छिपी एक उजली रात थी

जब देखा था मंज़रे-हसीन-हुस्न1 मैंने
उस लम्हा चाँद था और सितारों की बरात थी

साहिब हमें दाँव-पेंच नहीं आते इश्क़ में
और वह प्यार की पहली दूसरी हर मात थी

वह शब2 नहीं भूले जब घर आये थे तुम
उफ़! वह निगाह की निगाहों से मुलाक़ात थी

हम ने दर्द पहने, ओढ़े और बिछाये हैं
एक नयी जलन की यह एक नयी शुरूआत थी

हमने जिसे दिल में जगह दी उसने दग़ा3 किया
हर एक मतलबी की अपनी एक ज़ात थी

रात बादल नहीं थे और चाँद भी रोशन था
साथ हो रही उस की यादों की बरसात थी

जिसने मुझे छूकर तख़लीक़4 किया है ‘नज़र’
गोया5 वह भी इक नज़रे-इल्तिफ़ात6 थी

शब्दार्थ:
1. हसीन हुस्न वाले मंज़र; 2. रात; 3. धोख़ा; 4. आस्तित्व में लाना; 5. जैसे; 6. दोस्ती की नज़र


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

उसने हमसे कभी वफ़ा न की

उसने हमसे कभी वफ़ा न की
और हमने भी तमन्ना न की

बहुत बोलते हैं सब ने कहा
सो आदत-ए-कमनुमा न की

बहुत आये बहुत गये मगर
जान किसी पर फ़िदा न की

उसने कही और हमने मानी
उसकी कोई बात मना न की

ख़ता-ए-इश्क़ के बाद हमने
फिर कभी यह ख़ता न की

बात थी सो दिल में रह गयी
सामने पड़े तो नुमाया न की

जिससे मुँह फेर लिया हमने
फिर कभी बात आइंदा न की

उम्मीद मर गयी सो मर गयी
वह बाद कभी ज़िन्दा न की

चोट दोस्ती में खायी है ‘नज़र’
किसी से नज़रे-आशना न की


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

सहने दे ग़म थोड़ा-थोड़ा

सहने दे ग़म थोड़ा – थोड़ा
जो तुमने रुख़ मोड़ा-मोड़ा

जान यह जाने दे ज़रा-ज़रा
रहने दे आँखों को भरा-भरा

सपने सारे मेरे टूटे
जो साथी तुम मुझसे रूठे

मरना गर मेरा वफ़ा हो
तो मेरी जान क्यों ख़फ़ा हो

आना तो न जाना तुम कभी
तुमसे हैं मेरी जाँ ख़ाब सभी

साँसें बन जाओ ख़ाली सीने की
प्यास दे जाओ जीने की

दिल मेरा भी इक ख़ला है
तेरे इन्तिज़ार में जला है

ये लम्हे रोक लो तुम
फिर न आयेंगे हुए जो ग़ुम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४