तस्व्वुरे-हुस्नो-सादगिए-‘शीना’

सुबह-सा चेहरा, माथे पर सूरज-सी बिन्दिया
हँसी, जैसे ख़ुशबू हो कोई, गुनगुनाती हुई
आँखें साँवली-सी, कजरारी-सी
ऐसे झुकती और खुलती थीं
जैसे रात पे सुबह का दरिया बहा दिया हो
वह लट जब चेहरे पर गिरती थीं
यूँ लगता था मानो! बादल की ओट में चाँद हो

उसके पाँव की आहट जैसे बादे-सबा फूलों पर
रूप की सादगी ऐसी जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर
रंग बिल्कुल गुले-अंदाम ज़रा-सी बनावट नहीं
लब सुर्ख़ थे ऐसे, जिस तरह गुलाब के पैमाने
ज़ुबाँ नाज़ुक मिज़ाज, वाइज़ो-नासेह की तरह
बदन शीशे जैसा, साफ़-शफ़्फ़ाक़-गुल्फ़ाम
अदा में जुज़ सादगी और कुछ नहीं झलकता था

मालूम नहीं, वह बरस ख़ाब का था कि सच था
उसका वह मेरे घर आना
काँधे से गिरते वह कमर पे दुप्पटे की गाँठ
वह दीपावली के दिए, वह सजावट सब
देखना उसे मेरा एक टुक, सुबहो-शाम, रोज़
वह तूफ़ान जी का, कुछ करके दिखा दें
लिखना तेरा नाम दरो-दर पर, आदतन

आज पाँच बरस हो गये…
I’m still reminiscing about you…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा मोर मुकुट वाला
बजाये बाँसुरी श्रीकृष्ण हमारा
नाचूँ मगन नाचे वृंदावन सारा
राधा प्रेमी मीरा भी गोपाला
गोपियाँ पुजारन तेरी गोपाला

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा कमल नयन वाला
कजरारी आँखें मधु का प्याला
इनसे कैसा जादू छलका डाला
सलोना रूप बरखा के घन-सा
और दमकत मुख चंद्रमा-सा

बाँसुरी वाला वह नंद गोपाला
आया छोरा श्यामल तन वाला
गले में पड़ी प्रेम सुमन माला
प्रकृति का कण-कण मोह डाला
वह महंत सुन्दर हृदय वाला
छलका रहा करुणा का प्याला


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८

हाल तेरा कहीं मैंने तुझसे बेहतर जाना

हाल तेरा कहीं मैंने तुझसे बेहतर जाना
पर अफ़सोस कि तूने मुझे पत्थर जाना

वो महज़ इक जलन थी मेरे इस दिल की
तूने जिसे अपने दिल का निश्तर जाना

तू महरवश नहीं औरों की तरह मगर
मैंने तुझे अपनी हर निगह अख़्तर जाना

मेरे हाल पर हँसी आती है मेरे मसीहा को
ख़ुदा का यह रंग मैंने किसी से बेहतर जाना

कौन करेगा मेरी पैरवी ख़ुद मुंसिफ़ से
हर किसी ने उसे रक़ीब का दफ़्तर जाना

ख़ुदी में मग़रूर कैसे हो ख़ुदशनास भला
गर न कभी उसने मेरी आँखों को तर जाना

ख़ुदा से रश्क़ रखूँ या ख़ुद से शिकवा करूँ
मैंने सीखा नहीं इस राह के उधर जाना

थीं बहुत-सी ख़ूबियाँ मुझमें न जाने क्यों मगर
हर किसी ने मुझे ख़ुद से कमतर जाना

मेरे चार चराग़ों से रहे तेरा घर रौशन
तुम हर रथे-तीरगी से उतर जाना

मुझे ग़म था चुल्लूभर पानी के जितना
हैफ़ मैंने ज़रा से ग़म को समन्दर जाना


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००५